बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

भारत में यूरोपियों का आगमन: कारण, क्रम, कंपनियाँ और प्रभाव (UPSC, SSC नोट्स)|

भारत में यूरोपियों का आगमन

परिचय -

20 मई 1498 को केरल के कालीकट (कोझिकोड) के पास कप्पड़ तट पर तीन पुर्तगाली जहाज़ों ने लंगर डाला। इनके कप्तान वास्को डी गामा थे। उस दिन किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह यात्रा साढ़े चार सौ साल से ज़्यादा चलने वाले यूरोपीय दख़ल की शुरुआत है। यह दख़ल 1947 में ब्रिटिश शासन के अंत के बाद भी नहीं रुका। आख़िरी पुर्तगाली उपनिवेश गोवा 1961 में मुक्त हुआ।

इस लेख में आप जानेंगे कि यूरोपीय भारत क्यों आए, किस क्रम में आए और अंग्रेज़ बाकी सब से आगे क्यों निकले। साथ ही भारतीय पक्ष क्या था, यह भी देखेंगे। हर हिस्से के बाद एक परीक्षा पॉइंट है, जो UPSC, State PCS, SSC और रेलवे जैसी परीक्षाओं के काम आएगा।

भारत में यूरोपियों का आगमन


भारत में यूरोपियों के आगमन की पृष्ठभूमि

यूरोप और भारत का व्यापार बहुत पुराना है। रोमन साम्राज्य के दौर में भारतीय काली मिर्च और मलमल की इतनी माँग थी कि रोमन लेखक प्लिनी ने शिकायत की कि भारत, चीन और अरब को हर साल भारी मात्रा में सोना जा रहा है। दक्षिण भारत में मुज़िरिस बंदरगाह और अरिकामेडु (पुदुचेरी के पास) रोमन सिक्कों और मिट्टी के बर्तनों के प्रमाण देते हैं।

मध्यकाल में तस्वीर बदल गई। भारतीय माल अरब और फ़ारसी व्यापारियों के हाथों लाल सागर और मिस्र तक जाता था। वहाँ से वेनिस और जेनोआ के व्यापारी उसे यूरोप ले जाते थे। हर पड़ाव पर कर और मुनाफ़ा जुड़ता गया, इसलिए यूरोप पहुँचते-पहुँचते काली मिर्च की क़ीमत कई गुना हो जाती थी। यही "बिचौलियों" की समस्या पुर्तगाल और स्पेन जैसे देशों को खटकती थी।

परीक्षा पॉइंट: "आगमन" का मतलब पहला संपर्क नहीं, बल्कि सीधा समुद्री मार्ग है। प्राचीन भारत-रोम व्यापार (मुज़िरिस, अरिकामेडु) प्राचीन इतिहास के प्रश्नों से भी जुड़ता है।

पश्चिमी बिचौलिये थे अरब, वेनिस और जेनोआ। यूरोपीय शक्तियों का लक्ष्य इन्हें हटाकर सीधे स्रोत तक पहुँचना था।

भारत में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा कैसे होता है?


यूरोपियों के भारत आने के प्रमुख कारण

1. कुस्तुनतुनिया का पतन (1453)। तुर्क सुल्तान मेहमद द्वितीय ने कुस्तुनतुनिया (कॉन्स्टेंटिनोपल) जीत लिया। पूर्व की ओर जाने वाले पुराने रास्तों पर तुर्कों का नियंत्रण बढ़ा, कर महँगे हुए और यूरोपीय व्यापारियों के लिए जोखिम बढ़ा। इससे नए रास्ते की खोज को ज़रूरी धक्का मिला। हालाँकि आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि व्यापार पूरी तरह बंद नहीं हुआ था। असली वजह मुनाफ़े की होड़ थी, और तुर्कों का उदय उसे तेज़ करने वाला कारण बना।

परीक्षा पॉइंट: 1453 सबसे ज़्यादा पूछी जाने वाली तिथियों में है। विकल्प "व्यापार पूरी तरह बंद हो गया" ग़लत माना जा सकता है।

2. मसालों और कपड़े का मुनाफ़ा। काली मिर्च, दालचीनी, लौंग, सूती और रेशमी कपड़े, नील और कीमती पत्थर, इन सब की यूरोप में भारी माँग थी। मसाले सिर्फ़ स्वाद के लिए नहीं, दवा, इत्र और रुतबे के लिए भी ख़रीदे जाते थे।

परीक्षा पॉइंट: यूरोपीय भारत से मुख्यतः मसाले (काली मिर्च), सूती कपड़ा, रेशम और नील ले जाते थे।

3. तकनीक। क़ुतुबनुमा (कम्पास) और एस्ट्रोलेब जैसे नौवहन यंत्र अरबों और चीनियों के रास्ते यूरोप पहुँचे। पुर्तगालियों ने "कैरावेल" नाम का हल्का, तेज़ और मज़बूत जहाज़ बनाया और उस पर तोपें लगाईं। इसी से उन्हें हिंद महासागर में बढ़त मिली।

परीक्षा पॉइंट: कैरावेल पुर्तगाली जहाज़ था। पुर्तगालियों की असली ताक़त उनकी सशस्त्र नौसेना थी।

4. राज्य का संरक्षण। पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी "द नैविगेटर" (1394-1460) ने अफ़्रीकी तट की खोज यात्राओं को बढ़ावा दिया। 1494 की टॉर्डेसिलास संधि में पुर्तगाल और स्पेन ने दुनिया को आपस में बाँट लिया। पूर्व की ओर का इलाक़ा पुर्तगाल के हिस्से आया।

परीक्षा पॉइंट: टॉर्डेसिलास संधि (1494) पुर्तगाल-स्पेन के बीच थी, अंग्रेज़ों का इससे कोई लेना-देना नहीं।

5. धर्म। यूरोप में "प्रेस्टर जॉन" नाम के एक ईसाई राजा की कथा प्रचलित थी। पुर्तगाली उम्मीद करते थे कि पूर्व में ईसाई सहयोगी मिलेंगे। मालाबार में सीरियाई ईसाई सचमुच मौजूद थे। मसाले और ईसाई धर्म, दोनों की खोज साथ चली।

परीक्षा पॉइंट: पुर्तगाली उद्देश्यों को अक्सर "God, Gold, Glory" की तरह रटाया जाता है। उनमें व्यापार और धर्म-प्रचार दोनों शामिल थे।

एक आम फंदा: कोलंबस भारत की तलाश में निकला था और 1492 में अमेरिका पहुँच गया। इसी वजह से वहाँ के मूल निवासियों को "इंडियन" कहा गया। कोलंबस ने भारत की खोज नहीं की, यह अक्सर पूछा जाता है।

भारत में संसदीय प्रणाली सिर्फ किताबों का टॉपिक नहीं, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की लोकतंत्र की असली तस्वीर है।


नया समुद्री मार्ग: बार्थोलोम्यू डियाज़ से वास्को डी गामा तक

1487-88 में बार्थोलोम्यू डियाज़ अफ़्रीका के दक्षिणी सिरे तक पहुँचे, जिसे बाद में "केप ऑफ़ गुड होप" कहा गया। इससे साबित हो गया कि अफ़्रीका का चक्कर लगाकर पूर्व जाया जा सकता है। यही नक़्शा वास्को डी गामा के काम आया।

परीक्षा पॉइंट: केप ऑफ़ गुड होप पहुँचने वाले डियाज़ थे। भारत पहुँचने वाले वास्को डी गामा थे। दोनों नाम एक दूसरे से न बदलें।

वास्को डी गामा जुलाई 1497 में लिस्बन से चले। अफ़्रीका के पूर्वी तट पर मालिंदी में उन्हें एक गुजराती नाविक मिला, जिसकी मदद से वे अरब सागर पार कर 20 मई 1498 को कालीकट पहुँचे। वहाँ के शासक ज़मोरिन (सामूतिरी) थे। कहा जाता है कि लौटने पर माल की बिक्री से यात्रा की लागत से कई गुना कमाई हुई। यही मुनाफ़ा दूसरी यात्राओं का इंजन बना।

परीक्षा पॉइंट: ज़मोरिन कालीकट का शासक था। वास्को डी गामा का मार्गदर्शक एक भारतीय (गुजराती) नाविक बताया जाता है, इस पर प्रश्न आ चुके हैं।

इसके बाद 1500 में पेड्रो अल्वारेस कैब्राल तेरह जहाज़ों के बेड़े के साथ आया। उसने कालीकट में पहली पुर्तगाली फ़ैक्ट्री खोली, ऐसा ज़्यादातर पाठ्यपुस्तकों में लिखा है। वास्को डी गामा 1502 में दूसरी बार आया और इस बार उसने कड़ा रुख़ अपनाया। उसने अरब जहाज़ों पर हमला किया और कालीकट पर गोलाबारी की। यह "व्यापार और हिंसा साथ-साथ" वाली नीति की शुरुआत थी।

परीक्षा पॉइंट: "पहली फ़ैक्ट्री वास्को डी गामा ने खोली" जैसे कथन अक्सर ग़लत विकल्प के रूप में आते हैं। कोचीन में 1503 में बना फ़ोर्ट मैनुअल भारत का पहला पुर्तगाली क़िला माना जाता है।

पंचवर्षीय योजनाएँ


भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन: क्रम और तुलना

कंपनी

स्थापना / आगमन

पहला केंद्र

मुख्य ठिकाने

अंत

पुर्तगाली

1498 (आगमन)

कालीकट, कोचीन

गोवा, दमन, दीव

1961 तक

डच (VOC)

1602

मसूलीपट्टनम (1605)

पुलिकट, चिनसुरा, नागपट्टिनम

1759 में बेदारा की हार के बाद कमज़ोर

अंग्रेज़ (EIC)

1600

सूरत (1613)

मद्रास, बंबई, कलकत्ता

सत्ता में आए

डेनिश

1616

ट्रांकेबार (1620)

सेरामपुर

1845 में अंग्रेज़ों को बेचा

फ्रांसीसी

1664

सूरत (1668)

पांडिचेरी, चंदननगर

1763 के बाद राजनीतिक महत्वाकांक्षा ख़त्म

एक बात जो कई छात्रों को उलझाती है: आने का क्रम (पुर्तगाली, डच, अंग्रेज़, डेनिश, फ्रांसीसी) और कंपनी बनने का क्रम (अंग्रेज़ 1600, डच 1602) अलग हैं। अंग्रेज़ों की कंपनी पहले बनी, लेकिन डचों ने भारत में फ़ैक्ट्री पहले खोली (मसूलीपट्टनम, 1605)।

परीक्षा पॉइंट: "भारत आने का क्रम" पूछा जाए तो जवाब है पुर्तगाली → डच → अंग्रेज़ → डेनिश → फ्रांसीसी। "कंपनी बनने का क्रम" पूछा जाए तो जवाब है अंग्रेज़ (1600) → डच (1602) → डेनिश (1616) → फ्रांसीसी (1664)।

याद रखने का आसान तरीका: "पुड़िया डाल, अंडे फ्राई" यानी पु-डा-अं-डे-फ्रां (पुर्तगाली, डच, अंग्रेज़, डेनिश, फ्रांसीसी)।

परीक्षा पॉइंट: भारत आने वाली अंतिम यूरोपीय कंपनी फ्रांसीसी थी। सबसे पहले आने वाले और सबसे बाद तक टिकने वाले, दोनों पुर्तगाली थे।

जानिए प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों के बारे में एक आसान और interesting तरीके से।


पुर्तगाली: भारत में पहली यूरोपीय शक्ति

·         1505 में फ्रांसिस्को डी अल्मेडा पहला पुर्तगाली वायसराय बना। उसकी "ब्लू वॉटर पॉलिसी" का सीधा मतलब था कि ज़मीन पर क़िले बनाने से ज़्यादा अहम समुद्र पर क़ब्ज़ा है। 1509 में दीव की लड़ाई में उसने मिस्र-गुजरात के संयुक्त बेड़े को हराया, और उससे हिंद महासागर में पुर्तगाली दबदबा पक्का हो गया।    

 परीक्षा पॉइंट: ब्लू वॉटर पॉलिसी = अल्मेडा। 1509 दीव की लड़ाई भी उसी से जुड़ी है।

·    असली संस्थापक अल्फ़ॉन्सो डी अल्बुकर्क था। उसने 1510 में बीजापुर के आदिलशाही सुल्तान से गोवा छीना और उसे पुर्तगाली सत्ता की राजधानी बनाया। उसने पुर्तगाली सैनिकों को स्थानीय महिलाओं से विवाह के लिए प्रोत्साहित किया ताकि एक स्थायी आबादी बने। सती पर रोक लगाने का श्रेय भी उसे दिया जाता है। 1530 में नीनो डा कुन्हा ने राजधानी कोचीन से गोवा स्थानांतरित की।

 परीक्षा पॉइंट: गोवा (1510) = अल्बुकर्क, बीजापुर से। पुर्तगाली राजधानी: पहले कोचीन, 1530 से गोवा।

·    पुर्तगालियों की सबसे असरदार तरकीब थी कार्ताज़ (परमिट) प्रणाली। हिंद महासागर में कोई भी जहाज़ उनसे परमिट लिए बिना चल नहीं सकता था, वरना उसे पकड़ लिया जाता था। इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण 1613 का है, जब पुर्तगालियों ने सम्राट जहाँगीर की माँ मरियम-उज़-ज़मानी के जहाज़ "रहीमी" को पकड़ लिया। जहाँगीर इतने नाराज़ हुए कि उनका झुकाव अंग्रेज़ों की ओर बढ़ा, और उसी साल सूरत में अंग्रेज़ों को फ़ैक्ट्री मिली।

 परीक्षा पॉइंट: Cartaz–Armada–Kafila पुर्तगाली नौवहन नियंत्रण की त्रिमूर्ति है। मुग़ल जहाज़ों को भी उनसे परमिट लेना पड़ता था।

·    योगदान: 1556 में गोवा में भारत का पहला प्रिंटिंग प्रेस लगा। मिर्च, आलू, टमाटर, तंबाकू, काजू, अनानास और पपीता जैसी फ़सलें उन्हीं के ज़रिए भारत आईं। गोवा का बॉम जीसस बेसिलिका उनकी स्थापत्य विरासत है। हिंदी के कई रोज़मर्रा के शब्द (अलमारी, बाल्टी, चाबी, तौलिया, पादरी, मेज़) भी पुर्तगाली भाषा से आए बताए जाते हैं।

परीक्षा पॉइंट: भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस: गोवा, 1556, पुर्तगाली। तंबाकू, आलू और मिर्च की आमद भी उन्हीं से जुड़ती है।

·    पतन क्यों हुआ? धार्मिक असहिष्णुता (1560 में गोवा में इन्क्विज़िशन), भ्रष्टाचार, 1580-1640 में पुर्तगाल का स्पेन के अधीन रहना, और डच-अंग्रेज़ प्रतिस्पर्धा। 1739 में मराठों (चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में) ने बसीन और सालसेट जीत लिए। फिर भी गोवा, दमन और दीव 1961 तक पुर्तगालियों के पास रहे।

परीक्षा पॉइंट: गोवा, दमन, दीव 1961 में भारत में मिले। पुर्तगाली सबसे पहले आए और सबसे बाद में गए। 


डच, अंग्रेज़, डेनिश और फ्रांसीसी: चारों की कहानी

डच

1602 में यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी ऑफ़ द नीदरलैंड्स (VOC) बनी। डचों की असली रुचि इंडोनेशिया के मसाला द्वीपों में थी। भारत उनके लिए वह मंडी था जहाँ से कोरोमंडल तट का कपड़ा ख़रीदकर मसालों के बदले बेचा जाता था। उन्होंने 1605 में मसूलीपट्टनम में फ़ैक्ट्री खोली और पुलिकट (फ़ोर्ट गेल्ड्रिया) को केंद्र बनाया। 1741 में त्रावणकोर के मार्तंड वर्मा ने कोलाचेल की लड़ाई में उन्हें हराया, और 1759 में बेदारा की लड़ाई में अंग्रेज़ों ने भी।

परीक्षा पॉइंट: डचों की पहली फ़ैक्ट्री मसूलीपट्टनम (1605)। कोलाचेल (1741) में डचों को हराने वाला मार्तंड वर्मा था, जो एक भारतीय शासक की यूरोपीय शक्ति पर जीत का उदाहरण है।

अंग्रेज़

31 दिसंबर 1600 को महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को चार्टर दिया। शुरू में यह 15 साल का था, बाद में इसे अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया। कैप्टन हॉकिंस 1608 में सूरत पहुँचा और 1609 में जहाँगीर के दरबार में गया, पर पुर्तगाली विरोध से उसे सफलता नहीं मिली। 1612 में कैप्टन बेस्ट ने स्वाली की लड़ाई में पुर्तगालियों को हराया। 1615 में सर थॉमस रो जहाँगीर के दरबार में पहुँचा और व्यापारिक सुविधाओं का रास्ता खुला। 1613 में सूरत में स्थायी फ़ैक्ट्री बनी।

परीक्षा पॉइंट: हॉकिंस (1609) असफल रहा, रो (1615) सफल। पश्चिमी तट पर पहली फ़ैक्ट्री सूरत (1613)। दक्षिण-पूर्व में मसूलीपट्टनम (1611) भी अहम है।

फिर अंग्रेज़ों ने तीन ठिकाने बनाए। 1639 में फ़्रांसिस डे ने मद्रास में फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज बनवाया। 1668 में बंबई, जो इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय को पुर्तगाली राजकुमारी के दहेज में मिली थी, कंपनी को पट्टे पर मिली। 1690 में जॉब चार्नॉक ने कलकत्ता की नींव रखी। 1717 में सम्राट फ़र्रुख़सियर ने बंगाल में बिना चुंगी व्यापार का फ़रमान दिया, बदले में सालाना 3,000 रुपये पर। कहा जाता है कि शाही दरबार में अंग्रेज़ सर्जन विलियम हैमिल्टन ने बादशाह का इलाज किया था, जिसके बाद यह रियायत मिली।

परीक्षा पॉइंट: बंबई 1668 (दहेज से पट्टे तक), कलकत्ता 1690 (चार्नॉक), फ़रमान 1717 (फ़र्रुख़सियर)। इसे अक्सर "कंपनी का मैग्ना कार्टा" कहा जाता है।

डेनिश

डेनिश कंपनी 1616 में बनी और 1620 में तमिलनाडु के ट्रांकेबार में बस गई, जहाँ बना डैन्सबोर्ग क़िला आज भी है। बाद में सेरामपुर (बंगाल) दूसरा केंद्र बना। यहाँ की ख़ास बात व्यापार से ज़्यादा मिशनरी काम है। ट्रांकेबार में ज़ीगेनबाल्ग जैसे मिशनरियों ने आरंभिक तमिल छपाई की, और सेरामपुर मिशन से विलियम कैरी जुड़े थे। 1845 में डेनिश ठिकाने अंग्रेज़ों को बेच दिए गए।

परीक्षा पॉइंट: डेनिश ठिकाने: ट्रांकेबार (1620), सेरामपुर। 1845 में अंग्रेज़ों को बिके। विलियम कैरी और सेरामपुर मिशन का नाम शिक्षा और सामाजिक सुधार के प्रश्नों में भी आता है।

फ्रांसीसी

फ्रांसीसी कंपनी 1664 में लुई चौदहवें के मंत्री कोल्बेयर ने बनवाई। यह राजा के धन और संरक्षण पर टिकी थी, जबकि अंग्रेज़ कंपनी निजी व्यापारियों की थी, और यही फ़र्क़ आगे निर्णायक बना। सूरत में 1668 में फ़ैक्ट्री खुली, 1673 (कुछ स्रोतों में 1674) में फ़्रांस्वा मार्टिन ने पांडिचेरी बसाया, और 1690 में चंदननगर बसा।

परीक्षा पॉइंट: पांडिचेरी = फ़्रांस्वा मार्टिन। फ्रांसीसी कंपनी सरकारी थी, अंग्रेज़ कंपनी निजी। यह तुलना Mains में काम आती है।

राष्ट्रीय आय को समझना इतना मुश्किल नहीं है!


यूरोपीय शक्तियों का आपसी संघर्ष और अंग्रेज़ों की सफलता

अठारहवीं सदी में फ्रांसीसी और अंग्रेज़ आमने-सामने आ गए। 1742 में डूप्ले फ्रांसीसी गवर्नर बना और उसने एक नया तरीक़ा अपनाया: भारतीय सिपाहियों को यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित करना और हैदराबाद व अर्काट जैसी रियासतों की उत्तराधिकार की लड़ाइयों में दख़ल देना। कर्नाटक युद्ध (1746-63) तीन चरणों में हुए। दूसरे चरण में रॉबर्ट क्लाइव ने 1751 में अर्काट पर हमला कर पासा पलट दिया। तीसरे चरण में 1760 में वांडीवाश की लड़ाई में आयरकूट ने फ्रांसीसी जनरल लाली को हराया। 1763 की पेरिस संधि में फ्रांसीसियों को उनके ठिकाने लौटा दिए गए, पर सैन्य किलेबंदी की छूट नहीं मिली, जिससे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ख़त्म हो गई।

परीक्षा पॉइंट: वांडीवाश = 1760, आयरकूट बनाम लाली। तीसरा कर्नाटक युद्ध पेरिस संधि (1763) पर ख़त्म हुआ। डूप्ले को 1754 में वापस बुला लिया गया था।

बंगाल में प्लासी (23 जून 1757) और बक्सर (22 अक्टूबर 1764) ने अंग्रेज़ों को व्यापारी से शासक बना दिया। 1765 में इलाहाबाद की संधि से कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिली, यानी राजस्व वसूलने का अधिकार।

परीक्षा पॉइंट: प्लासी (1757), बक्सर (1764), दीवानी (1765)। दीवानी मिलने को अंग्रेज़ी राज की क़ानूनी शुरुआत माना जाता है।

अंग्रेज़ ही क्यों जीते? चार कारण अक्सर गिनाए जाते हैं। पहला, ब्रिटिश नौसेना की श्रेष्ठता, ख़ासकर सात वर्षीय युद्ध के दौरान। दूसरा, बंगाल जैसे धनी क्षेत्र से मिला राजस्व, जिससे युद्ध का ख़र्च निकला। तीसरा, निजी कंपनी की आर्थिक लचीलापन और संसद का समर्थन, जबकि फ्रांसीसी सरकार का ध्यान यूरोप के युद्धों में बँटा रहा। चौथा, भारतीय राजनीति की फूट।

परीक्षा पॉइंट: "अंग्रेज़ क्यों सफल हुए" Mains का पसंदीदा प्रश्न है। जवाब में एक भी कारण अकेला न लिखें। नौसेना, वित्त, कूटनीति और भारतीय फूट, इन सबको जोड़ें।

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP)


भारतीय दृष्टिकोण: भारतीय शासक और व्यापारी क्या कर रहे थे?

यह कहानी सिर्फ़ यूरोपीय जीत की नहीं है। कालीकट के ज़मोरिन के नौसैनिक सरदार कुंजाली मरक्कर दशकों तक पुर्तगालियों से लड़े। 1600 में आख़िरी कुंजाली मरक्कर ने आत्मसमर्पण किया। मुग़लों ने भी पुर्तगालियों को कड़ा जवाब दिया। शाहजहाँ ने 1632 में हुगली से पुर्तगालियों को खदेड़ दिया, और मराठों ने 1739 में बसीन छीना।

परीक्षा पॉइंट: कुंजाली मरक्कर = ज़मोरिन के नौसेनापति। हुगली की घेराबंदी (1632) = शाहजहाँ। ये उदाहरण "भारतीय प्रतिरोध" वाले उत्तर में मूल्य जोड़ते हैं।

लेकिन कई भारतीय शासक और व्यापारी यूरोपीयों को साझेदार भी मानते थे। कोचीन का राजा ज़मोरिन का विरोधी था और पुर्तगालियों का सहयोगी बना। गुजराती बनियों और तमिल चेट्टियारों ने यूरोपीय कंपनियों के साथ व्यापार में पैसा कमाया। साथ ही मुग़ल सत्ता 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु और 1739 के नादिर शाह के हमले के बाद कमज़ोर पड़ी। क्षेत्रीय शक्तियाँ आपस में उलझी रहीं, जिसका फ़ायदा कंपनी को मिला।

परीक्षा पॉइंट: 1707 (औरंगज़ेब की मृत्यु) और 1739 (नादिर शाह) को मुग़ल पतन के मोड़ के रूप में याद रखें। "यूरोपीय सफलता भारतीय राजनीतिक विभाजन से भी जुड़ी थी" वाला तर्क Mains में असरदार रहता है।


भारत पर यूरोपीय आगमन के प्रभाव

आर्थिक: शुरू में यह व्यापार था, जहाँ चाँदी भारत आती थी और मसाले-कपड़ा जाता था। बदलाव प्लासी के बाद आया, जब व्यापार राजस्व वसूली और संसाधन-दोहन में बदल गया। धन निष्कासन का सिद्धांत इसी दौर के बाद का है, इसे यूरोपियों के शुरुआती आगमन से सीधे न जोड़ें। फ़रमान और दस्तक (बिना चुंगी पास) का दुरुपयोग भी बंगाल के नवाबों से टकराव की वजह बना।

परीक्षा पॉइंट: "दस्तक का दुरुपयोग" प्लासी की पृष्ठभूमि में आता है। धन निष्कासन 1757 के बाद शुरू माना जाता है।

राजनीतिक: व्यापारिक चौकियाँ पहले क़िले बनीं और फिर क्षेत्रीय सत्ता। यूरोपीय झगड़ों का असर भारत में भी पड़ा, जिसका सबसे सीधा उदाहरण कर्नाटक युद्ध हैं।

परीक्षा पॉइंट: "ट्रेडिंग पोस्ट से साम्राज्य तक" इस पूरे अध्याय का सार है। इस वाक्य को अपने उत्तर की शुरुआत में इस्तेमाल किया जा सकता है।

सांस्कृतिक और सामाजिक: प्रिंटिंग प्रेस (गोवा, 1556), नई फ़सलें, गॉथिक और बारोक स्थापत्य, मिशनरी शिक्षा और नए शब्द। सेरामपुर की छापेख़ाना-परंपरा ने आगे चलकर भारतीय भाषाओं में छपाई को गति दी।

परीक्षा पॉइंट: सांस्कृतिक प्रभाव के उदाहरणों में गोवा प्रेस, आलू-टमाटर-मिर्च और सेरामपुर मिशन सबसे ज़्यादा काम आते हैं।

रॉलेट एक्ट 1919 – सम्पूर्ण जानकारी (Rowlatt Act in Hindi)


MCQs (PYQ)

प्रश्न 1. भारत आने वाली यूरोपीय शक्तियों में सबसे पहले आने वाली और सबसे बाद तक टिकने वाली शक्ति कौन सी थी? SSC CGL 2008
(a) पुर्तगाली (b) फ्रांसीसी (c) अंग्रेज़ (d) डच

उत्तर: (a) पुर्तगाली
व्याख्या: वास्को डी गामा 1498 में कालीकट पहुँचे और गोवा, दमन, दीव 1961 में भारत में मिले।

प्रश्न 2. स्वतंत्रता से पहले के भारत में व्यापारी के रूप में सबसे अंत में आने वाली यूरोपीय शक्ति कौन सी थी? IAS (Pre) 2007
(a) अंग्रेज़ (b) डच (c) फ्रांसीसी (d) पुर्तगाली

उत्तर: (c) फ्रांसीसी
व्याख्या: फ्रांसीसी कंपनी 1664 में बनी और यह पाँचों यूरोपीय शक्तियों में सबसे बाद में आई। ध्यान रहे कि प्रश्न "सबसे पहले जाने वाला" नहीं, "सबसे अंत में आने वाला" पूछ रहा है।

प्रश्न 3. भारतीय व्यापार में प्रवेश करने वाली इन यूरोपीय शक्तियों का सही कालक्रम चुनिए: UPPCS (Pre) 1997

  1. अंग्रेज़ 2. डच 3. फ्रांसीसी 4. पुर्तगाली
    (a) 4, 2, 1, 3 (b) 1, 2, 3, 4 (c) 3, 4, 2, 1 (d) 2, 3, 4, 1

उत्तर: (a) 4, 2, 1, 3
व्याख्या: क्रम है पुर्तगाली → डच → अंग्रेज़ → फ्रांसीसी। अंग्रेज़ कंपनी (1600) डच VOC (1602) से पहले बनी, पर डचों ने भारत में फ़ैक्ट्री पहले खोली (मसूलीपट्टनम, 1605)। इसी वजह से यह भ्रम पैदा होता है। (डेनिश इस सूची में नहीं हैं।)

 

प्रश्न 4. "नीला जल नीति" (Blue Water Policy) किस पुर्तगाली गवर्नर से जुड़ी है? SSC CGL 2016, उत्तराखंड PCS (Pre) 2016
(a) फ्रांसिस्को डी अल्मेडा (b) अल्फ़ॉन्सो डी अल्बुकर्क (c) फ्रांसिस कैरन (d) फ्रांसिस मार्टिन

उत्तर: (a) फ्रांसिस्को डी अल्मेडा
व्याख्या: अल्मेडा (1505 से पहला वायसराय) ने ज़मीनी क़िलों से ज़्यादा समुद्र पर नियंत्रण पर ज़ोर दिया। गोवा को जीतने (1510) वाला अल्बुकर्क था, और यही दोनों नाम आपस में उलझाए जाते हैं।

 

प्रश्न 5. अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को 1613 में कारखाना लगाने की अनुमति कहाँ मिली? IAS (Pre) 2006
(a) मद्रास (b) बंगलौर (c) मसूलीपट्टनम (d) सूरत

उत्तर: (d) सूरत
व्याख्या: 1612 में स्वाली की लड़ाई में कैप्टन बेस्ट ने पुर्तगालियों को हराया, और जहाँगीर के फ़रमान से 1613 में सूरत में स्थायी फ़ैक्ट्री बनी। कुछ स्रोत मसूलीपट्टनम (1611) को पहला ठिकाना मानते हैं, पर परीक्षा में 1613 और सूरत को "पहली फ़ैक्ट्री" के रूप में स्वीकार किया जाता है।

 

प्रश्न 6. पांडिचेरी (पुदुचेरी) के बारे में इन कथनों पर विचार कीजिए:

  1. वहाँ क़ब्ज़ा करने वाली पहली यूरोपीय शक्ति पुर्तगाली थी।
  2. वहाँ क़ब्ज़ा करने वाली दूसरी यूरोपीय शक्ति फ्रांसीसी थी।
  3. अंग्रेज़ों ने पांडिचेरी पर कभी क़ब्ज़ा नहीं किया।

UPPCS (Pre) 2006, IAS (Pre) 2010

कौन सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 2 और 3 (b) केवल 1 (c) केवल 3 (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) केवल 1
व्याख्या: पुर्तगाली सबसे पहले वहाँ पहुँचे, पर फ्रांसीसी दूसरे नहीं थे (बीच में डचों ने भी क़ब्ज़ा किया था)। अंग्रेज़ों ने भी पांडिचेरी को कई बार जीता था, इसलिए कथन 2 और 3 ग़लत हैं। फ्रांसीसियों ने बाद में इसे बसाया (फ़्रांस्वा मार्टिन, 1673)। ऐसे "निरपेक्ष कथन" वाले प्रश्नों में "कभी नहीं" जैसे शब्द से सावधान रहें।

 

प्रश्न 7. इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय को बंबई किस देश की राजकुमारी से विवाह के दहेज में मिला था? SSC CGL 2012
(a) फ्रांस (b) पुर्तगाल (c) हॉलैंड (d) डेनमार्क

उत्तर: (b) पुर्तगाल
व्याख्या: चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन ऑफ़ ब्रगांज़ा से हुआ। बाद में 1668 में बंबई ईस्ट इंडिया कंपनी को पट्टे पर मिली।

 

प्रश्न 8. भारत में फ्रांसीसियों ने अपना पहला कारखाना कहाँ लगाया? IAS (Pre) 2008
(a) पुलिकट (b) सूरत (c) कोचीन (d) कासिम बाज़ार

उत्तर: (b) सूरत
व्याख्या: पहला कारखाना 1668 के आसपास सूरत में और दूसरा मसूलीपट्टनम में लगा। पुलिकट डचों का प्रमुख केंद्र था।

 

प्रश्न 9. बेदारा (बेदरा) की लड़ाई में अंग्रेज़ों ने किस शक्ति को कुचल दिया? MPPSC (Pre) 2009
(a) डच (b) फ्रांसीसी (c) पुर्तगाली (d) डेनिश

उत्तर: (a) डच
व्याख्या: 1759 में बेदारा की हार के बाद भारत में डचों की राजनीतिक ताक़त लगभग ख़त्म हो गई। ध्यान रहे कि डचों को इससे पहले 1741 में कोलाचेल में त्रावणकोर के मार्तंड वर्मा ने भी हराया था।

 

प्रश्न 10. भारत में फ्रांसीसियों के भाग्य का फ़ैसला किस युद्ध ने कर दिया? IAS (Pre) 1993, SSC CHSL 2013
(a) बक्सर का युद्ध (b) प्रथम कर्नाटक युद्ध (c) प्लासी का युद्ध (d) वांडीवाश का युद्ध

उत्तर: (d) वांडीवाश का युद्ध
व्याख्या: 1760 में आयरकूट ने वांडीवाश में फ्रांसीसी सेनापति काउंट लाली को हराया। इसके बाद 1763 की पेरिस संधि ने फ्रांसीसियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ख़त्म कर दी।


निष्कर्ष

पूरी कहानी का सार यह है: नया समुद्री रास्ता खुला, फिर व्यापारिक होड़ चली, फिर यूरोपीय शक्तियों के बीच युद्ध हुए, और आख़िर में अंग्रेज़ सत्ता में आए। लेकिन इसमें भारतीय राजनीति, व्यापारी और प्रतिरोध की भूमिका भी उतनी ही अहम थी।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

भारत आने वाला पहला यूरोपीय कौन था?
वास्को डी गामा, जो पुर्तगाल से थे। वे 20 मई 1498 को कालीकट पहुँचे और इसी से भारत में यूरोपीय आगमन की शुरुआत मानी जाती है।

यूरोपीय कंपनियाँ भारत में किस क्रम में आईं?
पुर्तगाली (1498), डच (1602), अंग्रेज़ (1600 में कंपनी बनी, डचों के बाद स्थायी रूप से जमी), डेनिश (1616) और फ्रांसीसी (1664)।

भारत आने वाली अंतिम यूरोपीय कंपनी कौन सी थी?
फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी, जिसकी स्थापना 1664 में हुई।

यूरोपीय कंपनियों ने भारत में पहली फ़ैक्ट्री कहाँ लगाई?
पुर्तगालियों की पहली फ़ैक्ट्री कालीकट में, डचों की मसूलीपट्टनम (1605) में, अंग्रेज़ों की सूरत (1613) में, डेनिश की ट्रांकेबार (1620) में और फ्रांसीसियों की सूरत (1668) में।

अंग्रेज़ बाकी यूरोपीय शक्तियों से कैसे आगे निकले?
नौसैनिक श्रेष्ठता, बंगाल के राजस्व, निजी कंपनी की वित्तीय ताक़त, संसदीय समर्थन और भारतीय राजनीति की फूट, इन सब के मेल से।

पुर्तगाली भारत से कब गए?
गोवा, दमन और दीव 1961 में भारत में मिले। इस तरह पुर्तगाली सबसे बाद तक भारत में टिके रहे।

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