शनिवार, 13 जून 2026

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP) | अनुच्छेद 36 से 51 तक सम्पूर्ण विश्लेषण वर्गीकरण और वर्तमान प्रासंगिकता

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत

परिचय:

 

1947 में जब भारत आज़ाद हुआ, तो नई सरकार के सामने एक बड़ा सवाल थाकि क्या सिर्फ चुनाव करा देने से लोकतंत्र पूरा हो जाता है? या लोकतंत्र का मतलब यह भी है कि हर नागरिक के पास रोटी, शिक्षा और सम्मान हो?

संविधान निर्माताओं ने इस सवाल का जवाब दियाराज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों (Directive Principles of State Policy, DPSP) के रूप में।

सरल शब्दों में कहें तो DPSP वो निर्देश हैं जो संविधान ने सरकार को दिए हैं — "यह करो, वो करो, इस दिशा में चलो।" लेकिन अगर सरकार इन्हें माने, तो कोई अदालत में नहीं जा सकता। यही इनकी सबसे बड़ी विशेषता हैऔर यही इनकी सबसे बड़ी आलोचना भी। 

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP)

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP) क्या हैं?

 

भारतीय संविधान के भाग IV में, अनुच्छेद 36 से 51 तक, ये सिद्धांत दर्ज हैं। अनुच्छेद 37 साफ कहता है कि ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन "देश के शासन में ये मूलभूत हैं।"

DPSP की अवधारणा सीधे आयरलैंड के संविधान से आई। आयरलैंड ने खुद इसे स्पेन के संविधान से लिया था। लेकिन इसकी जड़ें और भी पुरानी हैंअमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा, फ्रांसीसी क्रांति के "Rights of Man" और गांधी जी के सर्वोदय के विचार में।


एक
रोचक बात: 1935 के Government of India Act में भी "Instruments of Instruction" नाम से कुछ ऐसे निर्देश थे जो गवर्नर-जनरल को दिए जाते थे। DPSP उसी विचार का लोकतांत्रिक विकास है।

1945 में Sapru Committee ने सिफारिश की थी कि अधिकारों को दो हिस्सों में बाँटा जाएवो जो अदालत में लागू हो सकें (Justiciable = मौलिक अधिकार), और वो जो नीति के रूप में काम करें (Non-justiciable = DPSP) यही ढाँचा हमारे संविधान में आया।

Dr. Ambedkar ने DPSP को संविधान की "Novel Feature" यानी नई और अनोखी विशेषता बताया था। उन्होंने कहा था कि जब भी कोई सरकार सत्ता में आए, उसे इन सिद्धांतों के आधार पर जनता जवाब माँग सकती हैभले ही अदालत माँग सके।


नीति निदेशक सिद्धांतों की मुख्य विशेषताएँ

DPSP को अन्य संवैधानिक प्रावधानों से अलग बनाने वाली कुछ खास बातें हैं:

·       Non-Justiciable: मौलिक अधिकारों के विपरीत, DPSP के उल्लंघन पर कोई अदालत में नहीं जा सकता।

·       Positive Obligation: ये सरकार को यह नहीं कहते कि "मत करो" — बल्कि कहते हैं "यह करो।" यही इन्हें Fundamental Rights से अलग बनाता है।

·       Welfare State का आधार: DPSP का पूरा ढाँचा इस विचार पर टिका है कि राज्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने का साधन नहीं, बल्कि लोगों के जीवन को बेहतर बनाने का जिम्मेदार है।

·       कानून की वैधता की कसौटी: अगर कोई कानून DPSP को आगे बढ़ाता है, तो सुप्रीम कोर्ट उसे अनुच्छेद 14 या 19 के मामूली उल्लंघन के बावजूद वैध मान सकती है।

·       मौलिक अधिकारों की पूरक: FR + DPSP मिलकर संविधान की "आत्मा और दर्शन" बनाते हैं।


DPSP का वर्गीकरण 

संविधान ने खुद DPSP को कोई वर्गीकरण नहीं दिया। लेकिन उनके विचारधारात्मक स्रोतों को देखते हुए विद्वानों ने इन्हें तीन हिस्सों में बाँटा है। इन्हें समझना ज़रूरी है क्योंकि परीक्षाओं में और असली जीवन में दोनों जगह यही काम आता है।

1. समाजवादी सिद्धांत

ये वो निर्देश हैं जो आर्थिक असमानता खत्म करने और एक कल्याणकारी राज्य बनाने की बात करते हैं।

अनुच्छेद

विषय

38

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करना

39

समान वेतन, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण, बच्चों का शोषण हो

39A

गरीबों को निःशुल्क कानूनी सहायता (1976 में जोड़ा गया)

41

बेरोजगारी, बुढ़ापे और बीमारी में सहायता का अधिकार

42

मातृत्व राहत और काम की न्यायसंगत परिस्थितियाँ

43

सभी कामगारों को निर्वाह योग्य मजदूरी

43A

उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी

47

पोषण स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार

इन सिद्धांतों की प्रेरणा मार्क्सवादी और समाजवादी विचारों से हैजहाँ राज्य की जिम्मेदारी है कि वो सिर्फ कानून बनाए, बल्कि लोगों की जिंदगी बेहतर भी करे।

2. गांधीवादी सिद्धांत

ये निर्देश गांधी जी की उस कल्पना से आते हैं जिसमें भारत की असली ताकत उसके गाँवों में है।

अनुच्छेद

विषय

40

ग्राम पंचायतों को स्वशासन की इकाइयाँ बनाना

43

कुटीर और ग्रामीण उद्योगों को प्रोत्साहन

43B

सहकारी समितियों का स्वायत्त और लोकतांत्रिक प्रबंधन (2011 में जोड़ा गया)

46

SC, ST और कमजोर वर्गों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों की रक्षा

47

नशीले पेय और मादक पदार्थों पर रोक

48

गोवध पर रोक, पशुपालन में सुधार

गांधी जी का मानना था कि दिल्ली से नहीं, बल्कि हर गाँव की पंचायत से असली स्वराज आएगा। अनुच्छेद 40 उसी सपने का संवैधानिक रूप है।

3. उदार-बौद्धिक सिद्धांत

ये वो निर्देश हैं जो एक आधुनिक, तर्कसंगत और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से प्रेरित हैं।

अनुच्छेद

विषय

44

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code)

45

6 वर्ष तक के बच्चों की प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल

48

कृषि और पशुपालन का आधुनिकीकरण

48A

पर्यावरण की रक्षा और वन्यजीव संरक्षण

49

ऐतिहासिक और कलात्मक महत्व के स्मारकों की रक्षा

50

न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना

51

अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना

 

यदि आप तीनों धाराओं को देखें तो समाजवादी सिद्धांत सबसे ज्यादा लागू हुए हैंन्यूनतम मजदूरी कानून, MGNREGA, मातृत्व लाभ। गांधीवादी सिद्धांतों में पंचायती राज एक बड़ी सफलता है। लेकिन उदार-बौद्धिक धारा में Uniform Civil Code (Article 44) अब तक पूर्ण रूप से लागू नहीं हो पाया है। इससे स्पष्ट है कि DPSP का क्रियान्वयन मुख्यतः राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है, क्योंकि ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं.


DPSP के बाहर के निर्देश: जो अक्सर छूट जाते हैं

 

यह एक ऐसा हिस्सा है जिसे अधिकांश notes और articles छोड़ देते हैं। लेकिन UPSC और अन्य परीक्षाओं में यही "hidden" जानकारी अंतर पैदा करती है।

संविधान में भाग IV के बाहर भी कुछ निर्देश हैं जो सरकार के लिए नीति-निर्देशक की भूमिका निभाते हैं:

अनुच्छेद 350A (भाग XVII): राज्य और स्थानीय निकायों को यह प्रयास करना चाहिए कि भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा मिले। आज भी कई राज्यों में उर्दू, तमिल या बंगाली बोलने वाले बच्चों को यह सुविधा नहीं मिलतीयानी यह निर्देश कागज पर ज्यादा और ज़मीन पर कम है।

अनुच्छेद 351 (भाग XVII): केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि हिंदी भाषा का विकास करे ताकि वो भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत को अभिव्यक्त कर सके। यह निर्देश एक तरफ हिंदी को बढ़ावा देता है, तो दूसरी तरफ अन्य भाषाओं से उसकी समृद्धि की भी बात करता है।

अनुच्छेद 335 (भाग XVI): SC और ST के दावों का ख्याल रखते हुए प्रशासनिक सेवाओं में उनकी नियुक्ति की जाए। यह निर्देश आरक्षण की नीति का संवैधानिक आधार बनाता है।

ये तीनों प्रावधान तकनीकी रूप से DPSP नहीं हैं, लेकिन इनकी प्रकृति वही हैnon-justiciable, नीति-निर्देशक, और सरकार के लिए एक नैतिक दायित्व।


मौलिक अधिकार बनाम DPSP


यह
DPSP का सबसे रोचक और परीक्षाओं में सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला पहलू है। सवाल यह हैजब एक कानून मौलिक अधिकारों को छीनता है लेकिन DPSP को लागू करता है, तो क्या होगा?

इस सवाल का जवाब Supreme Court ने दशकों में धीरे-धीरे विकसित किया।

Champakam Dorairajan Case (1951) — FRs की जीत

मद्रास सरकार ने धर्म और जाति के आधार पर मेडिकल सीटें आरक्षित की थीं। Champakam ने इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताकर चुनौती दी। Supreme Court ने फैसला दियामौलिक अधिकार, DPSP से ऊपर हैं। जहाँ टकराव हो, वहाँ FRs जीतेंगे।

इसके जवाब में संसद ने पहला संविधान संशोधन (1951) किया और Article 15(4) जोड़ाताकि सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान हो सकें।

Golaknath Case (1967) — Parliament की सीमाएँ

Punjab की Golaknath family की ज़मीन भूमि सुधार कानून में ली जा रही थी। Supreme Court ने 6:5 के बहुमत से कहासंसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती, चाहे DPSP लागू करना हो। यह एक बड़ा झटका था।

Kesavananda Bharati Case (1973) — Basic Structure की नींव

Kerala के एक मठ के महंत केशवानंद भारती ने राज्य सरकार के भूमि अधिग्रहण को चुनौती दी। 13 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनायासंसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसकी "मूल संरचना" (Basic Structure) नहीं बदल सकती।

और यहाँ DPSP को एक नई ताकत मिली Court ने माना कि FRs और DPSP दोनों मिलकर संविधान का लक्ष्य बनाते हैं, दोनों के बीच संतुलन ही असली संविधानवाद है।

Minerva Mills Case (1980) संतुलन ही Basic Structure है

42वें संशोधन ने DPSP को FRs से ऊपर रखने की कोशिश की थी। Supreme Court ने इसे खारिज करते हुए कहाFRs और DPSP का संतुलन खुद Basic Structure का हिस्सा है। कोई भी इन दोनों में से किसी को खत्म नहीं कर सकता।

Puttaswamy Case (2017) — Privacy और DPSP का नया आयाम

Aadhaar को चुनौती देते हुए इस केस में Supreme Court ने Privacy को मौलिक अधिकार माना। लेकिन इस फैसले में यह भी कहा गया कि सामाजिक कल्याण के लिए (जो DPSP की भावना है) Privacy पर कुछ उचित प्रतिबंध लग सकते हैं। यह आज के डिजिटल युग में DPSP की सबसे relevant व्याख्या है।

Janhit Abhiyan Case (EWS Reservation, 2022)

103वें संशोधन द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10% आरक्षण दिया गया। Supreme Court ने 3:2 के बहुमत से इसे वैध माना। इसमें Article 46 (DPSPकमजोर वर्गों के शैक्षणिक आर्थिक हितों की रक्षा) का सहारा लिया गया। यह दिखाता है कि DPSP आज भी नए कानूनों का आधार बनते हैं।


DPSP का कार्यान्वयन

 

यहाँ असली परीक्षा होती है। क्या DPSP सिर्फ कागज पर हैं, या इनका असर ज़िंदगियों पर भी पड़ा है?

क्लासिक कार्यान्वयन

भूमि सुधार: आजादी के बाद ज़मींदारी उन्मूलन, कार्यकाल की सुरक्षा और भूमि सीलिंग जैसे कानून DPSP Article 39 को लागू करने के प्रयास थे। West Bengal और Kerala में ये सुधार कुछ हद तक सफल रहे।

पंचायती राज (73वाँ संशोधन, 1992): यह Article 40 का सबसे बड़ा और सबसे सफल कार्यान्वयन है। आज भारत में 2.5 लाख से ज्यादा ग्राम पंचायतें हैं। केरल ने इसे इतनी मजबूती से लागू किया कि "Kerala Model of Decentralization" आज दुनिया भर में पढ़ाया जाता है।

निःशुल्क कानूनी सहायता (Article 39A): Legal Services Authorities Act, 1987 के तहत हर जिले में Legal Aid Clinics हैं। 2024 में National Legal Services Authority (NALSA) ने 1 करोड़ से ज्यादा लोगों को कानूनी सहायता दी।

2025 में DPSP की झलकनई योजनाएँ

National Education Policy (NEP) 2020 → Article 45: NEP ने 3 से 6 साल के बच्चों के लिए Early Childhood Care and Education (ECCE) को अनिवार्य बनाया। यह Article 45 का सीधा कार्यान्वयन है। Anganwadi केंद्रों को ECCE केंद्रों में बदलने की प्रक्रिया चल रही है।

Ayushman Bharat → Article 47: 5 लाख रुपये तक की मुफ्त स्वास्थ्य सेवा। 2024 तक 7 करोड़ से ज्यादा अस्पताल में भर्तियाँ हो चुकी थीं। यह Article 47 के सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार के निर्देश को लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

PM Vishwakarma Yojana (2023) → Article 43: लोहार, बढ़ई, कुम्हार, दर्जी जैसे पारंपरिक कारीगरों को कम ब्याज पर ऋण और प्रशिक्षण। यह Article 43 के कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के निर्देश का 21वीं सदी का रूप है।

MGNREGA और Article 41: मनरेगा (2006) ग्रामीण रोजगार का सबसे बड़ा जाल है। लेकिन एक ज़रूरी सवाल: 2023-24 में मनरेगा का budget पिछले कुछ सालों की तुलना में कम हुआ। जब Article 41 कहता है कि बेरोजगारी में सहायता मिलनी चाहिए, और बजट कट जाए, तो DPSP की सीमाएँ साफ दिखती हैंअदालत कुछ नहीं कर सकती।

State-wise Report Cardकौन आगे, कौन पीछे?

Kerala: Article 39A (निःशुल्क कानूनी सहायता) में अग्रणी। देश में सबसे मजबूत legal aid network साथ ही पंचायती राज में भी मॉडल राज्य।

Tamil Nadu: Article 43 और न्यूनतम मजदूरी में मजबूत स्थिति। राज्य सरकार ने कई क्षेत्रों में केंद्र से ज्यादा न्यूनतम मजदूरी तय की है।

Bihar और Uttar Pradesh: भूमि सुधार में बड़ी खाई बाकी है। भूमिहीन दलित परिवारों को ज़मीन मिलने की प्रक्रिया दशकों से अटकी हैArticle 39 के बावजूद।

यह reality check इसलिए ज़रूरी है क्योंकि DPSP की सफलता केंद्र और राज्य, दोनों की इच्छाशक्ति पर निर्भर है।


Constituent Assembly में DPSP पर बहस: जो इतिहास में दब गई

 

यह शायद DPSP का सबसे कम पढ़ा जाने वाला लेकिन सबसे दिलचस्प पहलू है। जब 1946-49 में संविधान सभा में DPSP पर बहस हुई, तो सभी एकमत नहीं थे।

 

K.T. Shah का विरोध: संविधान सभा के सदस्य K.T. Shah ने DPSP को "pious platitudes" यानी खोखली भावनाएँ कहा। उनका तर्क थाजिस चीज़ को अदालत लागू करा सके, उसे संविधान में लिखने का क्या फायदा? वो चाहते थे कि इन्हें या तो Fundamental Rights में शामिल किया जाए, या बिल्कुल हटा दिया जाए।

Ambedkar का जवाब: Dr. Ambedkar ने Shah को जवाब देते हुए कहा था कि भारत 1950 में एक ऐसा देश था जहाँ गरीबी, अशिक्षा और संसाधनों की कमी थी। अगर सभी DPSP को Fundamental Rights बना दिया जाता, तो राज्य उन्हें लागू नहीं कर पाता और अदालतें सरकार को रोज़ आदेश देने में डूब जातीं। DPSP एक "लचीला ढाँचा" हैजैसे-जैसे देश की क्षमता बढ़े, इन्हें लागू किया जाए।

यह तर्क आज भी प्रासंगिक है। 2009 में शिक्षा का अधिकार (RTE Act) आयायानी Article 45 (DPSP) को 59 साल बाद Article 21A (Fundamental Right) बनाया गया। यह Ambedkar की दूरदर्शिता का प्रमाण है।

Nehru का दृष्टिकोण: Jawaharlal Nehru ने DPSP को "positive obligations" कहा थासरकार की सकारात्मक जिम्मेदारियाँ। उनका मानना था कि FRs व्यक्ति को राज्य से बचाते हैं, जबकि DPSP राज्य को बताते हैं कि उसे व्यक्ति के लिए क्या करना है।

एक और दिलचस्प बात: कुछ सदस्यों ने यह भी माँग की थी कि Uniform Civil Code (Article 44) को सीधे Fundamental Right बनाया जाए। लेकिन यह माँग नहीं मानी गईक्योंकि उस समय देश के अलग-अलग धार्मिक समुदायों में सहमति नहीं थी। आज 75 साल बाद भी यही स्थिति है।


DPSP, मौलिक कर्तव्य और SDGs: एक त्रिकोणीय संबंध

 

DPSP को अकेले पढ़ने से उसकी पूरी ताकत नज़र नहीं आती। जब आप इसे मौलिक कर्तव्यों और UN के Sustainable Development Goals (SDGs) से जोड़ते हैं, तभी पूरी तस्वीर बनती है।

DPSP और Fundamental Duties (Article 51A) का संबंध

1976 में 42वें संशोधन के ज़रिए संविधान में Fundamental Duties जोड़े गए। और दिलचस्प बात यह है कि ये कई जगह DPSP के साथ मिलकर काम करते हैं:

·       Article 48A (DPSP): राज्य पर्यावरण की रक्षा करेगा।

·       Article 51A(g) (Fundamental Duty): हर नागरिक का कर्तव्य है कि वो पर्यावरण की रक्षा करे।

यानी एक तरफ राज्य की जिम्मेदारी है, दूसरी तरफ नागरिक की। दोनों मिलकर एक पूरी तस्वीर बनाते हैं। जब M.C. Mehta ने Ganga Pollution case (1988) में PIL दाखिल की, तो Supreme Court ने Article 48A और 51A(g) दोनों का सहारा लिया।

इसी तरह:

·       Article 45 (DPSP): बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा।

·       Article 51A(k) (Fundamental Duty): माता-पिता का कर्तव्य है कि बच्चे को स्कूल भेजें।

राज्य स्कूल बनाए, माता-पिता बच्चों को भेजेंयह सहयोग तभी काम करता है जब दोनों अपनी जिम्मेदारी निभाएँ।

DPSP और United Nations SDGs का तालमेल

2015 में UN ने 2030 तक के लिए 17 Sustainable Development Goals तय किए। जब आप इन्हें DPSP से मिलाते हैं, तो साफ होता है कि भारत के संविधान निर्माता 1950 में ही उन समस्याओं को पहचान चुके थे जिन्हें दुनिया ने 2015 में लिखा।

DPSP अनुच्छेद

विषय

संबंधित SDG

Article 47

सार्वजनिक स्वास्थ्य

SDG 3 — Good Health and Well-being

Article 48A

पर्यावरण संरक्षण

SDG 13 — Climate Action, SDG 15 — Life on Land

Article 39

संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण

SDG 10 — Reduced Inequalities

Article 41

रोजगार और सामाजिक सुरक्षा

SDG 8 — Decent Work and Economic Growth

Article 45

प्रारंभिक शिक्षा

SDG 4 — Quality Education

Article 40

स्थानीय स्वशासन

SDG 16 — Peace, Justice and Strong Institutions

यह comparison सिर्फ academic नहीं है। जब भारत SDG Progress Report में अपनी स्थिति बताता है, तो वो दरअसल बता रहा है कि DPSP कितने लागू हुए हैं।


DPSP की आलोचना और भविष्य

 

यह सवाल पूछना ज़रूरी हैऔर इसका जवाब पूरी तरह हाँ है, पूरी तरह नहीं।

आलोचनाएँ जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए

Sir Ivor Jennings की आपत्ति: ब्रिटिश संविधानविद् Jennings ने DPSP को "pious wishes" कहाऐसी इच्छाएँ जो अच्छी तो लगती हैं लेकिन लागू नहीं होतीं। उनका तर्क था कि Non-justiciable अधिकार असल में अधिकार नहीं होते।

इस आलोचना में दम है। जब MGNREGA का बजट कम होता है, जब Uniform Civil Code 75 साल से अटकी है, जब भूमिहीन दलित आज भी ज़मीन के इंतजार में हैंतो Jennings गलत नहीं लगते।

Non-justiciability की असली कीमत: मान लीजिए सरकार Article 39A के बावजूद गरीबों को कानूनी सहायता नहीं देती। तब? कोई PIL तो होगी, लेकिन Court सिर्फ "direction" दे सकती है, mandate नहीं। नागरिक के पास असली हथियार नहीं है।

Uniform Civil Code (Article 44) का राजनीतिक deadlock: यह भारत की सबसे लंबे समय से pending DPSP है। 1951 में Jawaharlal Nehru ने कहा था कि समय आने पर UCC लागू होगी। 2024 में Uttarakhand UCC लागू करने वाला पहला राज्य बना। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह अभी भी विवादित है। DPSP की यह कमज़ोरी साफ दिखती हैजब राजनीतिक सहमति नहीं, तो संवैधानिक निर्देश भी काम नहीं आता।

DPSP का बचाव भी ज़रूरी है

लेकिन DPSP को पूरी तरह खारिज करना भी गलत होगा।

RTE Act (2009) की मिसाल: Article 45 (DPSPप्रारंभिक शिक्षा) 59 साल DPSP रही, फिर उसे Article 21A के तहत Fundamental Right बनाया गया। यह दिखाता है कि DPSP एक "waiting room" की तरह हैजब देश तैयार हो, DPSP को FR में बदला जा सकता है।

PIL की ताकत: भले ही DPSP सीधे enforceable नहीं हैं, Supreme Court ने कई बार DPSP को PIL के जवाब में guidelines देने का आधार बनाया है। Olga Tellis Case (1985) में बेघरों के अधिकार को Article 41 से जोड़ा गया।

भविष्य का सवाल: क्या Climate Emergency में Article 48A को enforceable बनाने का समय गया है?

यह एक legitimate debate है। जब UN Climate Reports कह रही हैं कि 2030 तक emissions कम हुए तो consequences गंभीर होंगेतब Article 48A (पर्यावरण की रक्षा) को सिर्फ DPSP रहने देना काफी नहीं लगता।

कुछ विद्वान मानते हैं कि Supreme Court के पास यह अधिकार है कि वो Article 21 (जीवन का अधिकार) और Article 48A को मिलाकर एक "enforceable environmental right" तैयार करे। 2024 में Supreme Court ने एक फैसले में Climate Change को Article 21 से जोड़ायह उस दिशा में एक कदम था।

संक्षेप में: DPSP पूरी तरह "pious wishes" हैं और पूरी तरह enforceable rights वो एक living document हैंजो देश की क्षमता, सरकार की इच्छाशक्ति और नागरिकों की जागरूकता के साथ बदलते रहते हैं।


मौलिक अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध

 

संविधान freedoms देता है, लेकिन unrestricted freedom नहीं देता. Article 19 जैसे rights पर public order, morality, decency, security of state, sovereignty and integrity of India जैसे आधारों पर reasonable restrictions लगाए जा सकते हैं.

उदाहरण: peaceful protest protected है, लेकिन हिंसक protest protected नहीं है.


MCQs

प्र. 1. राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत भारतीय संविधान के किस भाग में वर्णित हैं? [UPSC Prelims 2015]

()भाग III

()भाग IV

()भाग IVA

()भाग V

उत्तर:
DPSP संविधान के भाग IV (अनुच्छेद 36–51) में वर्णित हैं। भाग III में मौलिक अधिकार और भाग IVA में मौलिक कर्तव्य हैं।

 

प्र. 2. भारतीय संविधान में नीति निदेशक सिद्धांतों की अवधारणा किस देश के संविधान से ली गई है? [UPSC Prelims 2013.]

() अमेरिका

() ऑस्ट्रेलिया

() आयरलैंड

() कनाडा


उत्तर:
DPSP की अवधारणा आयरलैंड के संविधान से ली गई हैआयरलैंड ने इसे स्पेन के संविधान से प्रेरित होकर अपनाया था

 

प्र. 3. निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश देता है? [UPSC Prelims 2019.]

() अनुच्छेद 40

() अनुच्छेद 43

() अनुच्छेद 44

() अनुच्छेद 48

 

उत्तर:
अनुच्छेद
44 राज्य को पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) सुनिश्चित करने का निर्देश देता है। यह सबसे विवादित DPSP है जो अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर लागू नहीं हुई।

 

प्र. 4. कौन-सा अनुच्छेद ग्राम पंचायतों को स्वशासन की इकाइयों के रूप में संगठित करने का निर्देश देता है? [UPSC Prelims 2017 ]

 

() अनुच्छेद 39

() अनुच्छेद 40

() अनुच्छेद 41

() अनुच्छेद 43


उत्तर
:
अनुच्छेद
40 राज्य को ग्राम पंचायतों को स्वशासन की इकाइयों के रूप में संगठित करने का निर्देश देता है। 73वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा इसे व्यवहार में लागू किया गया।

 

प्र. 5.  Minerva Mills Case (1980) का मुख्य निर्णय क्या था? [UPPCS Prelims 2018]

() DPSP मौलिक अधिकारों से ऊपर हैं

() मौलिक अधिकार और DPSP का संतुलन Basic Structure का हिस्सा है

() संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती

() DPSP न्यायालय द्वारा लागू हो सकते हैं

उत्तर:
Minerva Mills Case (1980) में Supreme Court ने कहा कि मौलिक अधिकारों और DPSP के बीच का संतुलन स्वयं संविधान की Basic Structure का हिस्सा है। 42वें संशोधन की वह व्यवस्था खारिज की गई जो DPSP को FRs से ऊपर रखती थी।

 

प्र. 6. 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा निम्नलिखित में से कौन-से अनुच्छेद DPSP में जोड़े गए? [UPSC Prelims 2020]

() अनुच्छेद 38, 39, 40

() अनुच्छेद 39A, 43A, 48A

() अनुच्छेद 41, 42, 43

() अनुच्छेद 44, 45, 46


उत्तर:
42वें संशोधन (1976) द्वारा DPSP में तीन नए अनुच्छेद जोड़े गए — 39A (निःशुल्क कानूनी सहायता), 43A (श्रमिकों की उद्योग प्रबंधन में भागीदारी) और 48A (पर्यावरण संरक्षण)

 

प्र. 7. निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद DPSP को न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं बताता? [BPSC Prelims 2019]

() अनुच्छेद 36

() अनुच्छेद 37

() अनुच्छेद 38

() अनुच्छेद 39


उत्तर
:
अनुच्छेद
37 स्पष्ट रूप से कहता है कि DPSP न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन ये देश के शासन में मूलभूत हैं और कानून बनाते समय इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है।

 

प्र. 8. Champakam Dorairajan Case (1951) के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? [UPSC Prelims 2016]

 

() इसमें DPSP को मौलिक अधिकारों से ऊपर माना गया

() इसमें मौलिक अधिकारों को DPSP से ऊपर माना गया

() इसमें Basic Structure Doctrine की स्थापना हुई

() इसमें 42वें संशोधन को खारिज किया गया


उत्तर:
Champakam Dorairajan Case (1951) में Supreme Court ने पहली बार स्पष्ट किया कि टकराव की स्थिति में मौलिक अधिकार, DPSP से ऊपर हैं। इसी के जवाब में संसद ने पहला संविधान संशोधन (1951) किया।

 

 

प्र. 9. निम्नलिखित में से कौन-सा DPSP गांधीवादी विचारधारा से संबंधित है? [SSC CGL 2020]

() अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता)

() अनुच्छेद 48 (गोवध निषेध)

() अनुच्छेद 41 (रोजगार का अधिकार)

() अनुच्छेद 50 (न्यायपालिका की स्वतंत्रता)


उत्तर
:
अनुच्छेद
48 गोवध पर प्रतिबंध और पशुपालन के वैज्ञानिक विकास की बात करता हैयह गांधीवादी DPSP है। गांधीवादी सिद्धांतों में अनुच्छेद 40, 43, 43B, 46, 47, 48 शामिल हैं।

 

प्र. 10. पर्यावरण की रक्षा और वन्यजीव संरक्षण का निर्देश संविधान के किस अनुच्छेद में है? [MPPSC Prelims 2021]

() अनुच्छेद 47

() अनुच्छेद 48

() अनुच्छेद 48A

() अनुच्छेद 51A(g)


उत्तर
:
अनुच्छेद
48A (42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया) राज्य को पर्यावरण की रक्षा, सुधार और वन-वन्यजीव संरक्षण का निर्देश देता है। अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों का मौलिक कर्तव्य है जो इसी दिशा में कार्य करता है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q: राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत कितने हैं?
अनुच्छेद 36 से 51 तक कुल 16 अनुच्छेदों में DPSP हैं। लेकिन Article 36 और 37 परिभाषात्मक हैं, इसलिए मुख्य निर्देश Article 38 से 51 में हैं।


Q: DPSP
और मौलिक अधिकार में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय हैंउनके उल्लंघन पर आप सीधे Supreme Court जा सकते हैं (Article 32) DPSP न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैंये सरकार के लिए नीति-निर्देश हैं, नागरिकों के लिए अधिकार नहीं।


Q:
कौन सा DPSP अभी तक लागू नहीं हुआ?
Article 44 (Uniform Civil Code) सबसे प्रमुख उदाहरण है। Uttarakhand (2024) को छोड़कर राष्ट्रीय स्तर पर आज तक UCC लागू नहीं हुई।


Q: 42
वाँ संशोधन DPSP के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
1976 में 42वें संशोधन ने तीन नए DPSP जोड़े (39A, 43A, 48A) और यह भी कोशिश की कि DPSP को FRs से ऊपर रखा जाए। Minerva Mills Case (1980) ने इस कोशिश को खारिज कर दिया।


Q:
क्या DPSP को अदालत में चुनौती दी जा सकती है?
DPSP खुद अदालत में enforceable नहीं हैं। लेकिन उनके आधार पर बने कानूनों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। और अगर कोई कानून DPSP को लागू करने के लिए बनाया गया है, तो वो मौलिक अधिकारों की कुछ सीमाओं के बावजूद वैध हो सकता है (Article 31C के तहत)


निष्कर्ष

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत तो बेकार हैं और ही सर्वशक्तिमान। वो एक नैतिक दस्तावेज़ हैंजो सरकार को याद दिलाते हैं कि सत्ता में आना काफी नहीं, सत्ता का इस्तेमाल किस दिशा में करना है, यह भी तय है।

जब 1950 में Dr. Ambedkar ने इन्हें "Novel Feature" कहा था, तो उन्होंने एक उम्मीद जताई थीकि जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ेगा, ये निर्देश असल हकीकत बनते जाएँगे। 75 साल में कुछ बने भीपंचायती राज, RTE, MGNREGA, Ayushman Bharat और कुछ अभी भी इंतजार में हैं।

DPSP की असली ताकत इसी में हैवो हर नई सरकार के सामने एक अधूरा एजेंडा रखते हैं। और लोकतंत्र में यही काम नागरिकों का भी हैउस एजेंडे को याद दिलाते रहना।


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