मराठा साम्राज्य
परिचय -
अगस्त 1666। आगरा में नज़रबंद एक राजा फलों और मिठाइयों की टोकरियों के सहारे औरंगज़ेब की पकड़ से निकल जाता है। आठ साल बाद वही राजा रायगढ़ में छत्रपति बनता है। यहीं से शुरू होता है मराठा साम्राज्य, जो आगे चलकर अटक से कटक तक फैला और 1818 में खत्म हुआ। यह लेख उस पूरे सफ़र को टाइमलाइन, तालिकाओं और "परीक्षा पॉइंट" के साथ समझाता है, ताकि आप UPSC, PCS या SSC में कोई भी सवाल बिना उलझे हल कर सकें।
मराठा साम्राज्य की टाइमलाइन
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वर्ष |
घटना |
क्यों महत्वपूर्ण |
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1630 (कुछ स्रोतों में 1627) |
शिवाजी का जन्म, शिवनेरी किला |
जन्म-वर्ष पर विकल्प में दोनों आ सकते हैं; महाराष्ट्र सरकार 1630 मानती है |
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1646 |
तोरणा किले पर कब्ज़ा |
स्वराज्य की शुरुआत |
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1659 |
प्रतापगढ़ में अफ़ज़ल खान का वध |
बीजापुर पर पहली बड़ी चोट |
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1665 |
पुरंदर की संधि |
शिवाजी को 23 किले मुग़लों को देने पड़े |
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1674 |
रायगढ़ में राज्याभिषेक |
छत्रपति की उपाधि |
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1680 |
शिवाजी का निधन |
संभाजी का दौर शुरू |
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1681-1707 |
मुग़ल-मराठा युद्ध (27 वर्ष) |
औरंगज़ेब की दक्कन नीति का अंत |
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1707 |
शाहू की रिहाई |
मराठा गृहयुद्ध की शुरुआत |
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1713 |
बालाजी विश्वनाथ पेशवा बने |
पेशवा युग की नींव |
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1761 |
पानीपत का तृतीय युद्ध |
उत्तर भारत में मराठा विस्तार रुका |
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1775-82 |
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध |
सालबाई की संधि |
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1803-05 |
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध |
बेसीन की संधि के बाद |
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1817-18 |
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध |
पेशवा पद समाप्त |
परीक्षा पॉइंट: चार वर्ष पक्के याद रखें: 1674 (उदय), 1707 (शाहू), 1761 (पानीपत), 1818
(अंत)। ज़्यादातर क्रम वाले सवाल इन्हीं के बीच बनते हैं।
मात्रक एवं मापन (Units & Measurements) Notes & PYQ.
मराठा साम्राज्य का उदय
मराठों का उदय अचानक नहीं था। चार चीज़ें एक साथ बनी थीं।
भूगोल। सह्याद्रि की पहाड़ियाँ, घाट और सैकड़ों किले। भारी मुग़ल घुड़सवार सेना यहाँ फंस जाती थी, जबकि मावले पैदल सैनिक इन्हीं रास्तों से रातों-रात निकल जाते थे। प्रतापगढ़ और सिंहगढ़ इसके उदाहरण हैं।
दक्कन की राजनीति। बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुंडा आपस में लड़ रहे थे और मुग़ल दबाव में थे। इस खाली जगह में शाहजी भोंसले जैसे सरदारों को जागीरें और सैन्य अनुभव मिला। शिवाजी को यही विरासत मिली।
भक्ति आंदोलन। तुकाराम, एकनाथ और रामदास ने मराठी भाषा और साझा पहचान को मज़बूत किया। यह सामाजिक आधार था, जिसने बाद में आम किसान को सैनिक बनाने में मदद की।
कुशल रणनीति। छापामार युद्ध (गनिमी कावा), तेज़ गतिशीलता और किलों का जाल। शिवाजी ने बड़ी सेना से सीधे टकराने के बजाय सप्लाई लाइन और समय पर चोट की।
छत्रपति शिवाजी
शुरुआती विजय
शिवाजी ने 1646 में पुणे के पास तोरणा किले पर कब्ज़ा कर शुरुआत की, फिर रायगढ़ को अपना केंद्र बनाया। असली परीक्षा 1659 में आई, जब बीजापुर ने अफ़ज़ल खान को भेजा। प्रतापगढ़ की तलहटी में मुलाक़ात तय हुई। शिवाजी ने बाघनख और बिछुए से अफ़ज़ल खान का वध किया और घात लगाए बैठी मराठा सेना ने बीजापुरी फ़ौज को घेर लिया।
1663 में शाइस्ता खान पुणे के लाल महल में था। शिवाजी रात में अपने सैनिकों के साथ घुसे और उस पर हमला किया। शाइस्ता खान की उंगलियाँ कटीं, पर वह बच निकला। 1664 और 1670 में शिवाजी ने मुग़लों के समृद्ध बंदरगाह सूरत को लूटा। इससे उनकी सेना का खर्च निकला और मुग़ल प्रतिष्ठा को चोट पहुँची।
पुरंदर की संधि (1665)
औरंगज़ेब ने मिर्ज़ा राजा जयसिंह को भेजा। मुग़ल घेराबंदी से मजबूर होकर शिवाजी को 11 जून 1665 को संधि करनी पड़ी। उन्होंने 35 में से 23 किले मुग़लों को सौंप दिए और 12 अपने पास रखे। संभाजी को मुग़ल मनसब मिला और शिवाजी ने बीजापुर अभियान में मुग़लों का साथ देने का वादा किया।
आगरा यात्रा और पलायन (1666)
शिवाजी औरंगज़ेब के दरबार में आगरा गए, पर उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। उन्हें नज़रबंद कर दिया गया। अगस्त 1666 में वे फलों-मिठाइयों की टोकरियों के सहारे वहाँ से निकले, ऐसी लोकप्रिय कथा है। इसके बाद उन्होंने कुछ वर्षों में खोए हुए किले वापस ले लिए।
राज्याभिषेक (1674)
6 जून 1674 को रायगढ़ में वाराणसी के विद्वान गागा भट्ट ने शिवाजी का राज्याभिषेक कराया। उन्हें छत्रपति की उपाधि मिली, और "हैंदव धर्मोद्धारक" जैसी उपाधियाँ भी जुड़ीं। इसका मक़सद केवल समारोह नहीं था। एक सामंती सरदार को स्वतंत्र संप्रभु शासक के रूप में मान्यता दिलाना था, ताकि दूसरे राज्य उसके साथ बराबरी से संधि कर सकें।
इसके बाद शिवाजी ने दक्षिण में अभियान (1676-78) किया। जिंजी और वेल्लोर तक का इलाक़ा जीता और गोलकुंडा के साथ गठबंधन किया। इसी अभियान से तंजावुर का मराठा राज्य बना, जहाँ उनके सौतेले भाई एकोजी का शासन था। 3 अप्रैल 1680 को शिवाजी का निधन हो गया।
परीक्षा
पॉइंट: "पुरंदर
की संधि" का सवाल आए तो साल देखें। 1665 है तो शिवाजी बनाम जयसिंह। 1776 है
तो कलकत्ता काउंसिल बनाम पेशवा सरकार। विकल्पों में दोनों रखकर परीक्षक उलझाते
हैं।
भारत में यूरोपियों का आगमन
शिवाजी का प्रशासन
अष्टप्रधान मंडल
शिवाजी ने राज्य चलाने के लिए आठ मंत्रियों की परिषद बनाई। इसमें पद वंशानुगत नहीं थे, और राजा ही अंतिम निर्णायक था।
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पद |
अन्य नाम |
मुख्य कार्य |
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पेशवा (मुख्य प्रधान) |
प्रधानमंत्री |
सामान्य प्रशासन |
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अमात्य |
मजूमदार |
वित्त और राजस्व का हिसाब |
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सचिव |
सुरनवीस/चिटनिस |
शाही पत्राचार |
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मंत्री |
वाकिया-नवीस |
गुप्तचर, राजा की निजी सुरक्षा |
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सेनापति |
सर-ए-नौबत |
सेना की भर्ती, प्रशिक्षण, अनुशासन |
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सुमंत |
दबीर |
विदेश मामले, समारोह |
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न्यायाधीश |
– |
न्याय |
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पंडितराव |
– |
धर्म और दान संबंधी कार्य |
याद रखने की चीज़: न्यायाधीश और पंडितराव को छोड़कर बाकी मंत्रियों को सैन्य कमान भी संभालनी पड़ती थी।
राजस्व व्यवस्था
शिवाजी की भूमि-व्यवस्था अहमदनगर के मलिक अंबर की प्रणाली से प्रेरित थी। भूमि की नाप काठी (छड़ी) से होती थी और पैदावार के आधार पर कर तय होता था। किसान से सीधे संबंध बनाने के लिए वंशानुगत देशमुख, देशपांडे और पाटिल जैसे बिचौलियों पर नियंत्रण रखा गया।
यहाँ एक सावधानी रखें। कई साइट्स लिखती हैं कि शिवाजी ने "ज़मींदारी खत्म कर रैयतवाड़ी लागू की"। यह सरलीकरण है। रैयतवाड़ी नाम बाद में ब्रिटिश दौर की व्यवस्था का है। सटीक बात यह है कि उन्होंने बिचौलियों पर नियंत्रण कड़ा किया और राज्य व किसान के बीच सीधा संबंध मज़बूत किया। परीक्षा में सीधे विकल्प "रैयतवाड़ी" का आए तो प्रचलित पाठ्यपुस्तक के हिसाब से ही उत्तर दें, पर Mains में यह बारीकी दिखाना फ़ायदेमंद है।
दो अतिरिक्त कर भी थे। चौथ पड़ोसी गैर-मराठा क्षेत्रों से कुल राजस्व का एक-चौथाई हिस्सा था, जो आक्रमण से बचाव के बदले लिया जाता था। सरदेशमुखी अतिरिक्त 10 प्रतिशत था, जिसे शिवाजी "सरदेशमुख" के वंशानुगत अधिकार के रूप में माँगते थे।
सेना और किले
पैदल सेना में मावले (पाइक), घुड़सवारों में बारगीर और शिलेदार थे। बारगीर को राज्य घोड़ा और हथियार देता था, जबकि शिलेदार अपने साधन लाते थे। सैनिकों को ज़्यादातर नकद वेतन मिलता था। किलों की ज़िम्मेदारी किलेदार के पास थी, और एक ही किले पर अलग-अलग जातियों के तीन अधिकारी रखे जाते थे ताकि कोई अकेला विद्रोह न कर सके।
परीक्षा
पॉइंट: चौथ
= 25%, सरदेशमुखी = 10%। दोनों गैर-मराठा क्षेत्रों से वसूले जाते थे। दोनों में
प्रतिशत की अदला-बदली एक आम जाल है।
भारतीय राजव्यवस्था का महत्वपूर्ण टॉपिक: संघीय प्रणाली
शिवाजी के बाद: संभाजी, राजाराम, ताराबाई और 27 साल का युद्ध
शिवाजी की मृत्यु के बाद औरंगज़ेब को लगा कि अब दक्कन आसान है। 1681 में वह खुद दक्कन पहुँचा और 1707 में अहमदनगर में उसकी मृत्यु हुई। बीच के 26 साल उसने वहीं बिताए। इसे 27 साल का मुग़ल-मराठा युद्ध (1681-1707) कहा जाता है।
संभाजी को 1689 में पकड़कर औरंगज़ेब ने मरवा दिया। राजधानी रायगढ़ भी मुग़लों के हाथ चली गई। यहीं से कहानी दिलचस्प होती है। संभाजी के छोटे भाई राजाराम जिंजी (तमिलनाडु) चले गए और वहाँ से लड़ाई चलाई। 1700 में राजाराम की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ताराबाई ने अपने नाबालिग बेटे शिवाजी द्वितीय के नाम पर सत्ता और युद्ध दोनों संभाले। मुग़ल एक-एक किला जीतते रहे, पर मराठा सरदार स्वतंत्र टुकड़ियों में लड़ते रहे और पूरा दक्कन लूट-खसोट और छापामार हमलों में उलझ गया। खज़ाना खाली हुआ और सेना थक गई।
1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़ल शहज़ादे आज़म शाह ने संभाजी के बेटे शाहू को रिहा कर दिया। रिहाई के पीछे चाल थी कि शाहू और ताराबाई आपस में उलझें। हुआ भी यही। अक्टूबर 1707 में खेड़ की लड़ाई में शाहू ने ताराबाई के पक्ष को हराया और सतारा में गद्दी संभाली। 1731 की वार्ना की संधि से मराठा राज्य दो हिस्सों में बँट गया: सतारा (शाहू) और कोल्हापुर (ताराबाई की शाखा)।
परीक्षा पॉइंट: यह खंड अक्सर "औरंगज़ेब की दक्कन नीति की विफलता" वाले प्रश्नों में काम आता है। तीन बिंदु लिखें: (1) 25 साल की अनुपस्थिति से उत्तर भारत का शासन कमज़ोर हुआ, (2) दक्कन अभियान से मुग़ल खज़ाना खाली हुआ, (3) मराठा प्रतिरोध खत्म नहीं हुआ बल्कि विकेंद्रित होकर और मज़बूत हुआ।
पेशवा युग
शाहू ने बालाजी विश्वनाथ को 1713 में पेशवा बनाया। यहीं से मराठा शासन का केंद्र छत्रपति से पेशवा की ओर खिसकने लगा। 1749 में शाहू की मृत्यु और 1750 की सांगोला की संधि के बाद छत्रपति केवल नाम के रह गए और पेशवा असली शासक बन गए। राजधानी भी सतारा से पुणे आ गई।
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पेशवा |
कार्यकाल |
मुख्य बात |
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बालाजी विश्वनाथ |
1713-1720 |
1719 में सैयद बंधुओं से समझौता: दक्कन के छह सूबों में चौथ-सरदेशमुखी का अधिकार और स्वराज्य को मान्यता। इतिहासकार इसे मराठों का "मैग्ना कार्टा" कहते हैं |
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बाजीराव प्रथम |
1720-1740 |
पालखेड़ (1728) में निज़ाम को हराया; 1737 में दिल्ली पर धावा; 1738 में भोपाल में निज़ाम पर विजय |
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बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) |
1740-1761 |
मराठा क्षेत्र की सबसे बड़ी सीमा; 1758 में अटक तक पहुँच; पानीपत की हार |
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माधवराव प्रथम |
1761-1772 |
पानीपत के बाद मराठा शक्ति का पुनरुत्थान |
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नारायणराव |
1772-1773 |
हत्या; रघुनाथराव की भूमिका पर विवाद |
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माधवराव द्वितीय |
1774-1795 |
नाना फड़नवीस के संरक्षण में बाल पेशवा |
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बाजीराव द्वितीय |
1796-1818 |
अंतिम पेशवा |
बाजीराव प्रथम को एक अच्छे उदाहरण से समझिए। पालखेड़ में उसने निज़ाम को सीधी लड़ाई में नहीं घेरा, बल्कि तेज़ घुड़सवार दस्तों से उसकी रसद काट दी। निज़ाम को घेरा तोड़ने के लिए संधि करनी पड़ी। यही गतिशील युद्ध-शैली 1737 में दिल्ली तक पहुँचने में काम आई, जब बाजीराव दिल्ली के पास मुग़ल सेना को चकमा देकर पहुँच गया। इन्हें अपने जीवन में कोई बड़ी लड़ाई हारने का श्रेय भी दिया जाता है। 1739 में उनके भाई चिमाजी अप्पा ने पुर्तगालियों से वसई (बेसीन) भी जीत लिया।
परीक्षा पॉइंट: "बालाजी विश्वनाथ का सबसे बड़ा योगदान क्या था?" का एक पंक्ति का
उत्तर: 1719 में सैयद हुसैन अली के साथ संधि और पेशवा पद को वंशानुगत बनाने की
नींव। "पालखेड़" 1728 और निज़ाम की संधि "मुंगी-शेवगाँव" साथ
याद रखें।
पंचवर्षीय योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका.
पानीपत का तृतीय युद्ध
पानीपत के सवाल इतिहास की किताबों में सबसे ज़्यादा बार आते हैं, और जवाब में अक्सर "मराठे हार गए" से आगे कुछ नहीं होता। इसलिए इसे कारण से परिणाम तक देखें।
पृष्ठभूमि। 1758 में रघुनाथराव की अगुवाई में मराठे अटक और पेशावर तक पहुँच गए थे। उत्तर-पश्चिम में अहमद शाह अब्दाली को यह खुली चुनौती थी। रुहेला सरदार नजीबुद्दौला ने अब्दाली को आमंत्रित किया। जल्द ही अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने भी अब्दाली का साथ दे दिया।
सेनापति। मराठा सेना का नेतृत्व सदाशिवराव भाऊ कर रहे थे, पेशवा के पुत्र विश्वासराव नाममात्र के सेनापति थे। तोपख़ाने की कमान इब्राहीम खान गार्दी के हाथ थी। साथ में होल्कर और सिंधिया जैसे सरदार थे।
हार के कारण।
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क्षेत्र |
क्या हुआ |
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सहयोगी |
राजपूतों और जाटों (सूरजमल) का साथ नहीं मिला; मराठों की चौथ-वसूली की नीति से उत्तर भारतीय शासक नाराज़ थे |
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रसद |
लंबे घेरे में खाने-पीने का सामान खत्म हो गया; सैनिक भूख से कमज़ोर थे |
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रणनीति |
भाऊ ने गतिशील छापामार शैली छोड़कर आमने-सामने की निर्णायक लड़ाई चुनी |
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शिविर |
सेना के साथ बड़ी संख्या में नागरिक, तीर्थयात्री और परिवार भी थे, जिससे गति और अनुशासन पर असर पड़ा |
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नेतृत्व |
विश्वासराव की मृत्यु की खबर फैलते ही सेना में अफ़रा-तफ़री मच गई |
परिणाम। मराठों को भारी जनहानि हुई। पेशवा नानासाहेब कुछ
महीने बाद 1761 में गुज़र गए। मराठों की उत्तर भारत में विस्तार की गति रुक गई। पर
यह अंत नहीं था। दस साल के अंदर माधवराव प्रथम ने मराठा सत्ता को फिर खड़ा
किया और 1771 में महादजी सिंधिया ने मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय को
दिल्ली की गद्दी पर वापस बैठाया।
जानिए प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों के बारे में.
मराठा संघ
पानीपत के बाद पेशवा के लिए इतने बड़े इलाके को सीधे चलाना संभव नहीं रहा। कमान क्षेत्रीय सरदारों के हाथ में गई, और मराठा साम्राज्य व्यवहार में एक संघ (Confederacy) बन गया। पुणे में पेशवा सर्वोच्च रहा, पर बाकी अपने इलाकों में लगभग स्वतंत्र चलते थे।
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परिवार |
क्षेत्र |
प्रमुख शासक |
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सिंधिया |
ग्वालियर, उज्जैन |
महादजी सिंधिया |
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होल्कर |
इंदौर, मालवा |
मल्हारराव, अहिल्याबाई होल्कर |
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गायकवाड़ |
बड़ौदा (गुजरात) |
दामाजी, फतेहसिंह |
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भोंसले |
नागपुर |
रघुजी भोंसले |
महादजी सिंधिया इसका बढ़िया उदाहरण हैं। उन्होंने फ्रांसीसी अफ़सर बेनोआ दे बॉयन की मदद से यूरोपीय ढंग की प्रशिक्षित पैदल सेना खड़ी की। इसी सेना के भरोसे उन्होंने दिल्ली के दरबार में मराठा दबदबा कायम किया और सालबाई की संधि (1782) में पेशवा की ओर से अंग्रेज़ों से मध्यस्थता भी की।
अहिल्याबाई होल्कर (1767-1795) महेश्वर से शासन चलाती थीं। उनकी ख्याति युद्ध से ज़्यादा प्रशासन की है। उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण (1780 के आसपास) और देशभर में मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं के निर्माण में योगदान दिया। लोकप्रिय स्मृति में वे न्यायप्रिय शासक मानी जाती हैं।
पुणे में नाना फड़नवीस ने माधवराव द्वितीय के नाबालिग रहते बारभाई परिषद (बारह मंत्रियों की परिषद) के ज़रिए शासन चलाया। इसे एक तरह की सामूहिक सरकार माना जाता है, जिसमें पेशवा नाम का था और फड़नवीस वास्तविक प्रशासक।
परीक्षा पॉइंट: संघ के चार घराने और उनकी राजधानियाँ एक साथ याद रखें, क्योंकि
"सुमेलित कीजिए" वाले प्रश्न इसी से बनते हैं। "बारभाई" और
"नाना फड़नवीस" का जोड़ भी बार-बार आता है।
राष्ट्रीय आय को समझना इतना मुश्किल नहीं है!
आंग्ल-मराठा युद्ध: तीनों की तुलना
अंग्रेज़ों ने मराठों को एक झटके में नहीं हराया। तीन चरणों में, हर बार पेशवा के घर के झगड़ों और सरदारों की आपसी खींचतान का फ़ायदा उठाकर।
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पहला (1775-82) |
दूसरा (1803-05) |
तीसरा (1817-18) |
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शुरुआत की वजह |
रघुनाथराव का उत्तराधिकार विवाद; अंग्रेज़ों ने साथ दिया |
होल्कर ने पेशवा को हराया; पेशवा ने बेसीन की संधि (1802) कर ली |
पिंडारियों के खिलाफ अभियान और पेशवा से नई शर्तें |
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अंग्रेज़ पक्ष |
वॉरेन हेस्टिंग्स |
लॉर्ड वेलेज़ली |
लॉर्ड हेस्टिंग्स |
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प्रमुख संधियाँ |
सूरत (1775), पुरंदर (1776), वडगाँव (1779), सालबाई (1782) |
बेसीन (1802), देवगाँव, सूरजी-अंजनगाँव (1803), राजपुरघाट (1805) |
पुणे (1817), ग्वालियर (1817), मंदसौर (1818) |
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नतीजा |
मराठों की बढ़त; सालबाई के बाद लगभग 20 साल शांति |
मराठा सरदारों की हार; अंग्रेज़ सर्वोच्च |
पेशवा पद समाप्त, मराठा स्वतंत्रता का अंत |
पहले युद्ध की कहानी। 1779 में वडगाँव के पास ब्रिटिश सेना को मराठा घेराबंदी में समर्पण जैसी स्थिति झेलनी पड़ी। यह मराठा सैन्य शक्ति का सबसे साफ़ प्रमाण था। 1782 की सालबाई की संधि में अंग्रेज़ों ने माधवराव द्वितीय को पेशवा माना और रघुनाथराव को पेंशन देकर अलग किया।
दूसरे युद्ध की जड़। 1802 में पुणे के पास होल्कर से हारकर पेशवा बाजीराव द्वितीय भागकर बेसीन पहुँचे। वहाँ उन्होंने अंग्रेज़ों से सहायक संधि पर हस्ताक्षर किए। यानी पेशवा ने अपनी विदेश नीति और सुरक्षा अंग्रेज़ों को सौंप दी। सिंधिया और भोंसले ने इसे आत्मसमर्पण माना और युद्ध छेड़ दिया। 1803 में असाये (आर्थर वेलेज़ली) और लासवारी (जनरल लेक) की लड़ाइयों में उनकी हार हुई।
तीसरे युद्ध का अंत। 1 जनवरी 1818 को कोरेगाँव भीमा में अंग्रेज़ों की छोटी टुकड़ी ने पेशवा की बड़ी सेना का सामना किया। यह लड़ाई आज भी महाराष्ट्र में स्मृति और विमर्श का विषय है। जून 1818 में बाजीराव द्वितीय ने जॉन मैल्कम के सामने समर्पण किया। उन्हें लगभग 8 लाख रुपये सालाना पेंशन पर कानपुर के पास बिठूर भेज दिया गया। पेशवा का पद खत्म हुआ और सतारा में एक छोटा राज्य प्रताप सिंह के नाम पर बनाया गया।
परीक्षा पॉइंट: तीन युद्ध, तीन गवर्नर-जनरल: हेस्टिंग्स, वेलेज़ली, हेस्टिंग्स। पहले और
तीसरे वाले का नाम एक जैसा है (वॉरेन हेस्टिंग्स और लॉर्ड हेस्टिंग्स), और परीक्षक
यहीं पकड़ते हैं। साथ ही "बेसीन की संधि = सहायक संधि" याद रखें।
राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP)
मराठा नौसेना और किले: जो आज भी विश्व धरोहर हैं
मराठा साम्राज्य का बड़ा हिस्सा समुद्र तट था। नौसेना की नींव शिवाजी ने रखी, पर उसे शिखर पर पहुँचाया कान्होजी आंग्रे (लगभग 1698-1729) ने। कोलाबा-अलीबाग से काम करते हुए उन्होंने पुर्तगाली, डच और अंग्रेज़ी जहाज़ों को लंबे समय तक कोंकण तट से दूर रखा। उनके जहाज़ों में गुराब (बड़े, तोप वाले) और गल्लिवट (40-50 पतवारों वाली छोटी नावें) शामिल थे। 1756 में पेशवा और अंग्रेज़ों ने मिलकर आंग्रे परिवार के गढ़ विजयदुर्ग (घेरिया) पर हमला किया, जिसके बाद नौसेना कमज़ोर पड़ गई।
किले मराठा सत्ता का आधार थे। जुलाई 2025 में यूनेस्को ने "भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य" शीर्षक से 12 किलों को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया। इनमें महाराष्ट्र के सालहेर, शिवनेरी, लोहगढ़, खांदेरी, रायगढ़, राजगढ़, प्रतापगढ़, सुवर्णदुर्ग, पन्हाला, विजयदुर्ग, सिंधुदुर्ग और तमिलनाडु का जिंजी किला हैं। परीक्षा में यह समसामयिकी और इतिहास का साझा क्षेत्र है। प्रकाशित करने से पहले संख्या और नाम यूनेस्को की आधिकारिक सूची से एक बार मिला लें।
परीक्षा पॉइंट: "कान्होजी आंग्रे" का नाम और "कोलाबा" का जोड़ याद
रखें। जिंजी वह किला है जहाँ राजाराम ने मुग़लों से बचकर शासन चलाया, और अब यही
यूनेस्को सूची में है।
रॉलेट एक्ट 1919 – सम्पूर्ण जानकारी (Rowlatt Act in Hindi)
मराठा साम्राज्य के पतन के कारण
पतन किसी एक कारण से नहीं हुआ। इसे दो हिस्सों में बाँटकर लिखें तो उत्तर साफ़ बनता है।
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आंतरिक |
बाहरी |
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पेशवा और सरदारों के बीच खींचतान |
पानीपत की हार (1761) |
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कमज़ोर और विवादित उत्तराधिकार (रघुनाथराव प्रकरण) |
अंग्रेज़ों की कूटनीति और सहायक संधि |
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जागीर-आधारित सैन्य व्यवस्था और सरदारों की अर्ध-स्वतंत्रता |
यूरोपीय तोपख़ाने और अनुशासित पैदल सेना की तकनीकी बढ़त |
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खज़ाने पर दबाव और चौथ पर निर्भरता |
बेहतर वित्तीय संसाधन और संगठन वाली ईस्ट इंडिया कंपनी |
MCQs (PYQ)
1. (UPSC 1995)
पानीपत के तृतीय युद्ध में
मराठा सेना का नेतृत्व किसने किया?
(a) बाजीराव प्रथम
(b) माधवराव प्रथम
(c) सदाशिवराव भाऊ
(d) महादजी सिंधिया
उत्तर: (c)।
सदाशिवराव भाऊ
2. (UPSC 1995)
मोडी लिपि का प्रयोग किनके दस्तावेज़ों
में होता था?
(a) वोडेयार
(b) ज़मोरिन
(c) होयसल
(d) मराठा
उत्तर: (d)। मराठों ने प्रशासनिक और राजस्व अभिलेखों में मोडी
लिपि अपनाई।
3. (UPSC 1995)
अष्टप्रधान किस प्रशासन में मंत्रियों की परिषद थी?
(a) गुप्त
(b) चोल
(c) विजयनगर
(d) मराठा
उत्तर: (d)। मराठा
4. (UPSC 1998)
शिवाजी के अष्टप्रधान में विदेश मामलों को कौन देखता था?
(a) पेशवा
(b) सचिव
(c) पंडितराव
(d) सुमंत
उत्तर: (d)। सुमंत
5. (UPSC 2000)
संभाजी के बाद मराठा प्रशासन को किसने सुव्यवस्थित किया?
(a) राजाराम
(b) बालाजी विश्वनाथ
(c) गंगाबाई
(d) नानाजी देशमुख
उत्तर: (b)। बालाजी विश्वनाथ ने संभाजी के बाद प्रशासन का
पुनर्गठन किया और शाहू के पक्ष में सरदारों का समर्थन जुटाया।
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निष्कर्ष
मराठा साम्राज्य को याद रखने का सबसे आसान तरीका एक कहानी की तरह पढ़ना है: शिवाजी ने स्वराज्य खड़ा किया, संभाजी-राजाराम-ताराबाई ने उसे औरंगज़ेब के सामने टिकाए रखा, पेशवाओं ने उसे अटक तक फैलाया, पानीपत ने रफ़्तार रोकी, और आपसी बिखराव के कारण अंग्रेज़ों ने 1818 तक उसे खत्म कर दिया। हर मोड़ पर एक संधि, एक युद्ध और एक व्यक्ति था, और वही परीक्षा के प्रश्न बनते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
मराठा
साम्राज्य की स्थापना किसने की?
छत्रपति शिवाजी ने। 1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ और उन्हें छत्रपति
की उपाधि मिली।
मराठा
साम्राज्य का अंतिम पेशवा कौन था?
बाजीराव द्वितीय। 1818 में तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद उन्होंने अंग्रेज़ों के
सामने समर्पण किया और उन्हें बिठूर भेज दिया गया।
अष्टप्रधान
क्या थे?
शिवाजी के आठ मंत्रियों की परिषद: पेशवा, अमात्य, सचिव, मंत्री, सेनापति, सुमंत,
न्यायाधीश और पंडितराव।
पानीपत
का तृतीय युद्ध कब हुआ?
14 जनवरी 1761 को, मराठों और अहमद शाह अब्दाली के बीच।
चौथ और
सरदेशमुखी में क्या अंतर है?
चौथ राजस्व का 25% था और सरदेशमुखी अतिरिक्त 10%। दोनों गैर-मराठा क्षेत्रों से
वसूले जाते थे।
तीनों
आंग्ल-मराठा युद्ध कब हुए?
पहला 1775-82, दूसरा 1803-05 और तीसरा 1817-18।
