संघीय प्रणाली
परिचय -
अगर आपने कभी सोचा है कि दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार और आपके राज्य की सरकार एक साथ कैसे चलती हैं, बिना एक-दूसरे को पूरी तरह खत्म किए — तो आप असल में संघीय प्रणाली को ही समझने की कोशिश कर रहे हैं। यह सिर्फ किताबी शब्द नहीं है। जब दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच अधिकारों को लेकर खींचतान होती है, जब कोई राज्यपाल किसी बिल पर महीनों दस्तखत नहीं करता, या जब GST काउंसिल में राज्य अपनी बात मनवाने के लिए जूझते हैं — यह सब संघीय प्रणाली के असली इम्तिहान हैं।
इस लेख में हम परिभाषा से शुरू करेंगे, लेकिन वहीं नहीं रुकेंगे। हम यह भी देखेंगे कि यह व्यवस्था व्यवहार में कैसे काम करती है, कहां टकराती है, और परीक्षा के नज़रिए से आपको क्या-क्या याद रखना है।
संघीय प्रणाली का अर्थ और परिभाषा
सीधी भाषा में कहें तो संघीय प्रणाली सरकार की वह व्यवस्था है जिसमें सत्ता एक ही जगह केंद्रित नहीं होती, बल्कि संविधान के ज़रिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच बांट दी जाती है। दोनों अपने-अपने दायरे में स्वतंत्र होकर काम करते हैं — कोई एक-दूसरे का "बॉस" नहीं होता, कम से कम सिद्धांत रूप में तो नहीं।
राजनीति विज्ञानी के.सी. व्हिएर ने इसे बहुत सटीक ढंग से परिभाषित किया था — उनके अनुसार संघीय व्यवस्था वह है जिसमें केंद्रीय और क्षेत्रीय सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में समान रूप से स्वतंत्र और समन्वित होती हैं। मतलब, कोई एक-दूसरे के अधीन नहीं होता।
अब इसे एकात्मक (Unitary) व्यवस्था से समझें, तो फर्क तुरंत साफ हो जाता है:
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पहलू |
संघीय व्यवस्था |
एकात्मक व्यवस्था |
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सत्ता का केंद्र |
केंद्र और राज्यों में बंटी |
पूरी तरह केंद्र में |
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उदाहरण |
अमेरिका, कनाडा, स्विट्ज़रलैंड, भारत |
ब्रिटेन, फ्रांस, जापान |
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राज्यों की स्थिति |
संविधान से शक्तियां प्राप्त, स्वायत्त |
केंद्र की इच्छा पर निर्भर |
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बदलाव की गुंजाइश |
कठिन, संविधान संशोधन ज़रूरी |
आसान, संसद कानून बदल सकती है |
यह
व्यवस्था आमतौर पर उन देशों में अपनाई जाती है जो भौगोलिक रूप से बड़े हैं या जहां
भाषा, धर्म, संस्कृति की भारी विविधता है। भारत दोनों ही मामलों में फिट बैठता है
— यही वजह है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने एकात्मक की बजाय संघीय ढांचा चुना।
संसद कैसे चलती है?
भारत की संघीय व्यवस्था — अर्द्ध-संघीय क्यों?
अब यहां से चीज़ें दिलचस्प होती हैं। भारत का संविधान अनुच्छेद 1 में कहता है — "भारत, राज्यों का एक संघ होगा।" ध्यान दीजिए, यहां "संघ" (Union) शब्द इस्तेमाल हुआ है, "फेडरेशन" नहीं। यह चुनाव जान-बूझकर किया गया था।
क्यों? क्योंकि भारत का संघ अमेरिका की तरह अलग-अलग स्वतंत्र राज्यों के आपस में मिलकर बनाया गया समझौता नहीं है। यहां केंद्र पहले मज़बूत था और राज्यों को उसने अधिकार दिए — इसे राजनीति विज्ञान की भाषा में "Holding Together Federalism" कहते हैं, जबकि अमेरिका वाला मॉडल "Coming Together Federalism" कहलाता है। यह फर्क आगे तुलना वाले सेक्शन में और साफ होगा।
भारत को अक्सर अर्द्ध-संघीय (Quasi-Federal) व्यवस्था कहा जाता है — यह टर्म खुद के.सी. व्हिएर ने भारत के संविधान का अध्ययन करने के बाद दी थी। वजह साफ है: हमारे संविधान में संघीय और एकात्मक, दोनों तरह की विशेषताएं मौजूद हैं।
एकात्मक तत्व:
- पूरे देश के लिए एक ही नागरिकता (कोई राज्य की अलग नागरिकता नहीं, जैसा स्विट्ज़रलैंड में होता है)
- राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र करता है, राज्य की जनता नहीं चुनती
- अखिल भारतीय सेवाएं (IAS, IPS) — जो राज्य में काम करती हैं पर भर्ती और नियंत्रण केंद्र के हाथ में
- आपातकाल के दौरान केंद्र राज्य के अधिकार अपने हाथ में ले सकता है (अनुच्छेद 356)
- राज्यों की सीमाएं बदलने का अधिकार संसद के पास है, राज्यों की सहमति अनिवार्य नहीं
संघीय तत्व:
- लिखित और कठोर संविधान
- केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा
- स्वतंत्र और सर्वोच्च न्यायपालिका
- द्विसदनीय संसद, जहां राज्यसभा राज्यों की आवाज़ है
डॉ.
अंबेडकर ने संविधान सभा में इसे बहुत खूबसूरती से समझाया था — उनका कहना था कि
हमारा संविधान समय और परिस्थिति के हिसाब से कभी संघीय तो कभी एकात्मक रूप ले सकता
है। शांति के समय यह संघीय व्यवस्था की तरह काम करता है, लेकिन संकट के समय केंद्र
के पास पूरी व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की ताकत होती है। यही लचीलापन भारतीय
संघवाद की सबसे बड़ी खासियत है।
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संवैधानिक आधार — शक्तियों का विभाजन
यहां असली सवाल आता है: तय कैसे होता है कि कौन-सा कानून केंद्र बनाएगा और कौन-सा राज्य? इसका जवाब है संविधान की सातवीं अनुसूची, जो शक्तियों को तीन सूचियों में बांटती है।
संघ सूची (Union List): इसमें वे विषय हैं जिन पर पूरे देश में एक जैसी नीति ज़रूरी है — रक्षा, विदेश मामले, बैंकिंग, मुद्रा, रेलवे, दूरसंचार। यहां सिर्फ संसद कानून बना सकती है।
राज्य सूची (State List): पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय सरकारें, राज्य के भीतर व्यापार जैसे विषय। सामान्य परिस्थिति में सिर्फ राज्य विधानसभा इन पर कानून बना सकती है।
समवर्ती सूची (Concurrent List): शिक्षा, वन, विवाह-तलाक, दिवालियापन, आर्थिक और सामाजिक योजना जैसे विषय — इन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। अगर टकराव हो, तो केंद्र का कानून मान्य होगा।
जो विषय इन तीनों सूचियों में नहीं आते, उन्हें अवशिष्ट
शक्तियां (Residuary Powers) कहा जाता है, और भारत में इनका मालिक केंद्र है —
अमेरिका में यह उल्टा है, वहां अवशिष्ट शक्तियां राज्यों के पास हैं। यह छोटा-सा
फर्क बताता है कि भारत का केंद्र संवैधानिक रूप से ही राज्यों से ज़्यादा मज़बूत
बनाया गया है।
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भारतीय संघवाद का ऐतिहासिक विकास
भारत का संघीय ढांचा अचानक नहीं बना, यह धीरे-धीरे विकसित हुआ।
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 पहली बार भारत में एक संघीय ढांचे की कल्पना लेकर आया, लेकिन देसी रियासतों के शामिल न होने की वजह से यह पूरी तरह लागू नहीं हो सका। इससे पहले साइमन कमीशन (1927-28) और बटलर कमेटी (1927-30) ने भी पूरे भारत के लिए एक संघीय ढांचे की सिफारिश की थी।
आज़ादी से ठीक पहले कैबिनेट मिशन योजना (1946) ने एक ढीले-ढाले संघ का प्रस्ताव रखा था, जिसमें ज़्यादातर शक्तियां राज्यों के पास रहतीं। लेकिन संविधान सभा में हुई बहस के बाद यह तय हुआ कि विभाजन के बाद अस्थिर हालात में देश को एक मज़बूत केंद्र की ज़रूरत है — इसलिए हमने केंद्र-भारी मॉडल अपनाया।
आज़ादी के बाद भी यह सफर एक जैसा नहीं रहा:
- 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के दौर में 42वें संविधान संशोधन (1976) ने केंद्र की शक्तियां और बढ़ाईं। इसे अक्सर "मिनी संविधान" कहा जाता है क्योंकि इसने संघवाद के संतुलन को काफी हद तक केंद्र की तरफ झुका दिया।
- 1990 के दशक में गठबंधन राजनीति और आर्थिक उदारीकरण के दौर ने तस्वीर पलट दी। क्षेत्रीय दल मज़बूत हुए, राज्यों की सौदेबाज़ी की ताकत बढ़ी, और केंद्र का दबदबा कम होने लगा।
यह
उतार-चढ़ाव आज भी जारी है, और आगे के सेक्शन में हम देखेंगे कि यह 2019 के बाद
कैसे नया मोड़ लेता है।
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भारतीय संघवाद की विशेषताएं
संक्षेप में, वे मुख्य बिंदु जो भारत को एक संघीय व्यवस्था बनाते हैं:
- द्विस्तरीय (अब त्रिस्तरीय) शासन — केंद्र, राज्य, और 73वें-74वें संशोधन के बाद पंचायत व नगरपालिका स्तर पर स्थानीय सरकार
- लिखित और कठोर संविधान — जिसे बदलना आसान नहीं, कुछ प्रावधानों के लिए आधे राज्यों की सहमति ज़रूरी
- संविधान की सर्वोच्चता — न संसद, न विधानसभा, संविधान से ऊपर नहीं
- स्वतंत्र न्यायपालिका — केंद्र-राज्य विवादों में सुप्रीम कोर्ट अंतिम निर्णायक
- द्विसदनीय विधायिका — राज्यसभा में राज्यों को प्रतिनिधित्व मिलता है, हालांकि जनसंख्या के आधार पर यह असमान है
सहकारी, प्रतिस्पर्धी और राजकोषीय संघवाद
सिर्फ किताबी परिभाषा जानना काफी नहीं — यह समझना ज़्यादा ज़रूरी है कि केंद्र और राज्य असल ज़िंदगी में किस तरह के रिश्तों में बंधे होते हैं।
सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism): इसका मतलब है केंद्र और राज्य मिलकर काम करें, प्रतिद्वंद्वी बनकर नहीं। नीति आयोग, अंतर-राज्य परिषद (अनुच्छेद 263), और GST काउंसिल इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। कोविड-19 के दौरान वैक्सीनेशन अभियान में केंद्र और राज्यों के तालमेल को दुनिया भर में सराहा गया था — यह सहकारी संघवाद की एक मिसाल है जब यह असल में काम करता है।
प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism): 1990 के आर्थिक उदारीकरण के बाद राज्य अब निवेश आकर्षित करने के लिए एक-दूसरे से होड़ करते हैं — बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर, आसान नियम, टैक्स छूट देकर। गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच निवेश को लेकर होने वाली प्रतिस्पर्धा इसका सीधा उदाहरण है।
राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism): पैसे का बंटवारा कैसे हो, यह तय करता है वित्त आयोग (अनुच्छेद 280),
जो हर पांच साल में केंद्र और राज्यों के बीच टैक्स राजस्व के बंटवारे की सिफारिश
करता है। अनुच्छेद 275 के तहत केंद्र राज्यों को अनुदान भी देता है ताकि
वित्तीय असंतुलन को कम किया जा सके।
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भारतीय संघवाद से जुड़े हालिया विवाद
यह वो हिस्सा है जो ज़्यादातर लेखों में छूट जाता है, लेकिन परीक्षा और समझ दोनों के लिहाज़ से सबसे ज़रूरी है।
अनुच्छेद 370 का निरसन: अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया गया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों — जम्मू-कश्मीर और लद्दाख — में बांट दिया गया। यह भारतीय संघवाद के इतिहास में एक बड़ा मोड़ था, क्योंकि पहली बार किसी पूर्ण राज्य का दर्जा घटाकर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, लेकिन इसने केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन पर लंबी बहस छेड़ दी।
दिल्ली बनाम केंद्र: दिल्ली की चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों की लड़ाई सालों से चली आ रही है — खासकर सेवाओं (Services) पर नियंत्रण को लेकर। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन इसके तुरंत बाद केंद्र ने अध्यादेश लाकर उस फैसले को काफी हद तक पलट दिया, जो बाद में GNCTD संशोधन अधिनियम का रूप ले चुका है। यह मामला दिखाता है कि केंद्र शासित प्रदेश और राज्य के बीच का फर्क संघवाद में कितना बड़ा असर डालता है।
राज्यपाल बनाम राज्य सरकार: तमिलनाडु, केरल और पंजाब जैसे राज्यों में विधानसभा से पास हुए बिलों को राज्यपाल द्वारा महीनों तक रोके रखने के मामले हाल के वर्षों में बार-बार सुर्खियों में रहे हैं। राज्य सरकारों का आरोप है कि यह देरी जान-बूझकर की जाती है ताकि उनके कामकाज में अड़चन आए।
केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल: CBI और ED जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के इस्तेमाल पर विपक्ष-शासित राज्यों ने बार-बार सवाल उठाए हैं, यह कहते हुए कि इनका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। इस विषय पर संसद और सुप्रीम कोर्ट, दोनों जगह बहस होती रही है।
परिसीमन (Delimitation): आगामी जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों के फिर से बंटवारे को लेकर दक्षिणी
राज्यों में चिंता है — क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया
है, इसलिए उन्हें डर है कि सीटों का नया बंटवारा उनका प्रतिनिधित्व घटा सकता है,
जबकि उत्तर के ज़्यादा आबादी वाले राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं। यह मुद्दा आने
वाले वर्षों में संघवाद की एक बड़ी परीक्षा बन सकता है।
रॉलेट एक्ट 1919 – सम्पूर्ण जानकारी (Rowlatt Act in Hindi)
संघवाद को आकार देने वाले प्रमुख न्यायिक फैसले
अदालतों ने समय-समय पर तय किया है कि संघवाद की सीमाएं कहां तक हैं।
केशवानंद भारती मामला (1973): इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संघवाद संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का हिस्सा है — यानी इसे संसद संविधान संशोधन के ज़रिए भी पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती।
एस.आर. बोम्मई मामला (1994): यह फैसला अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के दुरुपयोग पर लगाम लगाने के लिए जाना जाता है। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने से पहले उसे विधानसभा में बहुमत साबित करने का मौका मिलना चाहिए, और राष्ट्रपति शासन का फैसला न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है। इस फैसले ने केंद्र की मनमानी पर काफी हद तक रोक लगाई।
हालिया गवर्नर से जुड़े फैसले: तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा बिलों को लंबे समय तक रोके रखने के मामले में
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की और राज्यपालों के लिए बिलों पर फैसला लेने की
समय-सीमा तय करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। यह दिखाता है कि न्यायपालिका आज भी
संघवाद के संतुलन को बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभा रही है।
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भारत बनाम अन्य देशों का संघवाद — तुलनात्मक विश्लेषण
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पहलू |
भारत |
अमेरिका |
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संघ बनने का तरीका |
Holding Together (मज़बूत केंद्र ने राज्यों को शक्तियां दीं) |
Coming Together (स्वतंत्र राज्यों ने मिलकर संघ बनाया) |
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अवशिष्ट शक्तियां |
केंद्र के पास |
राज्यों के पास |
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नागरिकता |
एकल, पूरे देश के लिए एक |
दोहरी — राष्ट्रीय और राज्य दोनों |
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अलग होने का अधिकार |
नहीं |
संविधान में स्पष्ट नहीं, पर ऐतिहासिक रूप से विवादित रहा |
|
संकट में केंद्र की शक्ति |
बहुत अधिक (अनुच्छेद 356, 352) |
सीमित |
स्विट्ज़रलैंड और कनाडा
जैसे देशों में भी संघवाद के अलग-अलग मॉडल हैं — स्विट्ज़रलैंड में स्थानीय
स्वायत्तता (कैंटन व्यवस्था) बहुत मज़बूत है, जबकि कनाडा में क्यूबेक जैसे राज्यों
को विशेष सांस्कृतिक स्वायत्तता दी गई है। भारत का मॉडल इन सबसे अलग है क्योंकि यह
ज़रूरत पड़ने पर एकात्मक व्यवस्था की तरह भी काम कर सकता है — यही वजह है कि इसे
"अर्द्ध-संघीय" कहा जाता है, कोई भी दूसरा देश ठीक इस तरह का मिश्रण
नहीं रखता।
भारत का संघ और राज्यक्षेत्र.
संघीय प्रणाली की चुनौतियां और आलोचना
हर व्यवस्था की तरह, भारतीय संघवाद भी कुछ गंभीर सवालों से जूझता है:
- राज्यपाल की भूमिका — जब राज्यपाल केंद्र में सत्तारूढ़ दल के प्रति ज़्यादा वफादार नज़र आते हैं, तो राज्य सरकार के कामकाज में रुकावट आती है
- राजकोषीय असंतुलन — कई राज्य राजस्व के लिए केंद्रीय अनुदान पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं, जिससे उनकी स्वतंत्रता सीमित हो जाती है
- अखिल भारतीय सेवाओं पर नियंत्रण — IAS-IPS अधिकारी राज्य में काम करते हैं पर उनका नियंत्रण केंद्र के पास है, जिससे कभी-कभी टकराव होता है
- आपातकालीन प्रावधानों का इतिहास — अतीत में अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल राजनीतिक कारणों से भी हुआ है, हालांकि बोम्मई फैसले के बाद इसमें कमी आई है
- क्षेत्रीय दलों की सौदेबाज़ी शक्ति — गठबंधन सरकारों के दौर में क्षेत्रीय दल अक्सर अपने राज्य के हितों को राष्ट्रीय नीति से ऊपर रखते हैं, जिससे नीति-निर्माण में देरी होती है
MCQs (PYQ)
1. गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 (UPSC 2024)
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- इसने ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देसी रियासतों के संघ पर आधारित एक अखिल भारतीय महासंघ (All India Federation) की स्थापना का प्रावधान किया।
- रक्षा और विदेश मामलों को संघीय विधायिका के नियंत्रण में रखा गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 न ही 2
सही उत्तर: (a) केवल 1। रक्षा और विदेश मामले गवर्नर-जनरल के नियंत्रण में ही रहे, संघीय विधायिका को नहीं सौंपे गए।
2. संघीय चरित्र की आवश्यक विशेषता (UPSC 2022)
भारतीय राजनीति में निम्नलिखित में से कौन-सा एक आवश्यक विशेषता है जो इसके
संघीय चरित्र को दर्शाती है?
(a) न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुरक्षित है
(b) संघीय विधायिका में घटक इकाइयों के निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं
(c) संघीय मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय दलों के निर्वाचित प्रतिनिधि हो सकते हैं
(d) मौलिक अधिकार न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं
सही उत्तर: (b)। राज्यसभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व से ही संसद में संघीय चरित्र झलकता है।
3. गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 — अवशिष्ट शक्तियां (UPSC 2018)
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के तहत स्थापित संघ में अवशिष्ट शक्तियां
किसे दी गई थीं?
(a) संघीय विधायिका
(b) गवर्नर-जनरल
(c) प्रांतीय विधायिका
(d) प्रांतीय गवर्नर
सही उत्तर: (b) गवर्नर-जनरल।
4. पांचवीं और छठी अनुसूची (UPSC 2015)
भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची में दिए गए प्रावधान
किसलिए बनाए गए हैं?
(a) अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा के लिए
(b) राज्यों के बीच सीमाएं तय करने के लिए
(c) पंचायतों की शक्तियां, अधिकार और जिम्मेदारियां तय करने के लिए
(d) सभी सीमावर्ती राज्यों के हितों की रक्षा के लिए
सही उत्तर: (a)।
5. गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1919 (UPSC 2015)
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1919 ने स्पष्ट रूप से क्या परिभाषित किया?
(a) न्यायपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों का पृथक्करण
(b) केंद्र और प्रांतीय सरकारों का अधिकार-क्षेत्र
(c) भारत सचिव और वायसराय की शक्तियां
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
सही उत्तर: (b)। मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने द्वैध शासन की शुरुआत करते हुए केंद्र-प्रांत शक्ति विभाजन को स्पष्ट किया।
6. 14वां वित्त आयोग (UPSC 2015)
14वें वित्त आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- इसने केंद्रीय विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी 32% से बढ़ाकर 42% कर दी।
- इसने क्षेत्र-विशिष्ट अनुदानों (sector-specific grants) पर सिफारिशें कीं।
सही उत्तर: केवल कथन 1 सही है।
7. राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियां (UPSC 2014)
निम्नलिखित में से कौन-सी राज्य के राज्यपाल को दी गई विवेकाधीन शक्तियां हैं?
- राष्ट्रपति शासन लगाने हेतु राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजना
- मंत्रियों की नियुक्ति करना
- राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कुछ बिलों को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना
- राज्य सरकार के कामकाज संचालन के नियम बनाना
सही उत्तर: 1 और 3 केवल।
8. त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था (UPSC 2025)
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- सभी राज्यों में मध्यवर्ती स्तर पर पंचायतें मौजूद हैं।
- मध्यवर्ती स्तर की पंचायत का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए।
- मध्यवर्ती स्तर की पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा हेतु आयोग का गठन राज्य का मुख्यमंत्री करता है।
कौन-से कथन सही नहीं हैं?
सही उत्तर के लिए ध्यान दें — तीनों कथन गलत हैं: छोटे राज्यों में मध्यवर्ती स्तर
अनिवार्य नहीं, न्यूनतम आयु 21 वर्ष है, और वित्त आयोग का गठन राज्यपाल करता है,
मुख्यमंत्री नहीं।
निष्कर्ष
संघीय प्रणाली को सिर्फ "केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा" कहकर समझ लेना आसान है, लेकिन असल में यह एक जीवंत, लगातार बदलती व्यवस्था है। संविधान सभा में जो संतुलन तय हुआ था, वह आज भी GST काउंसिल की बहसों में, राज्यपाल और राज्य सरकारों की खींचतान में, और परिसीमन जैसे मुद्दों में हर दिन परखा जा रहा है।
भारत का अर्द्ध-संघीय मॉडल न पूरी तरह केंद्रीकृत है, न पूरी तरह विकेंद्रीकृत — और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी। एक तरफ यह देश को संकट के समय एकजुट रखने की ताकत देता है, तो दूसरी तरफ राज्यों की स्वायत्तता को लेकर लगातार सवाल भी खड़े करता है।
परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए सलाह यही है — अनुच्छेदों और परिभाषाओं को रटने से आगे बढ़िए। यह समझिए कि केशवानंद भारती और एस.आर. बोम्मई जैसे फैसले क्यों आए, अनुच्छेद 370 के निरसन ने संघवाद की बहस को किस दिशा में मोड़ा, और GST काउंसिल जैसी "सहकारी" व्यवस्था में केंद्र का पलड़ा भारी क्यों रहता है। यही समझ आपको सिर्फ सही जवाब देने वाला नहीं, बल्कि विषय को गहराई से जानने वाला उम्मीदवार बनाएगी — और यही फर्क परीक्षा में असल में दिखता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
क्या भारत एक पूर्ण संघीय राष्ट्र है?
नहीं। भारत में संघीय और एकात्मक, दोनों तरह की विशेषताएं मौजूद हैं, इसलिए इसे अर्द्ध-संघीय (Quasi-Federal) व्यवस्था कहा जाता है।
भारत को अर्द्ध-संघीय राष्ट्र क्यों कहा जाता है?
क्योंकि यहां एक तरफ शक्तियों का बंटवारा, लिखित संविधान और स्वतंत्र न्यायपालिका जैसे संघीय तत्व हैं, तो दूसरी तरफ एकल नागरिकता, राज्यपाल की केंद्रीय नियुक्ति और आपातकालीन प्रावधान जैसे एकात्मक तत्व भी मौजूद हैं।
भारतीय संघवाद और अमेरिकी संघवाद में क्या अंतर है?
भारत का संघ केंद्र से राज्यों की तरफ शक्तियां देकर बना (Holding Together), जबकि अमेरिका के स्वतंत्र राज्य आपस में मिलकर संघ बने (Coming Together)। इसके अलावा अवशिष्ट शक्तियां भारत में केंद्र के पास हैं, अमेरिका में राज्यों के पास।
सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद में क्या फर्क है?
सहकारी संघवाद में केंद्र और राज्य मिलकर काम करते हैं (जैसे GST काउंसिल, नीति आयोग), जबकि प्रतिस्पर्धी संघवाद में राज्य निवेश और विकास के लिए आपस में होड़ करते हैं।
संघीय प्रणाली की तीन सूचियां कौन-सी हैं?
संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची — यह तीनों संविधान की सातवीं अनुसूची में दी गई हैं और केंद्र-राज्य के बीच कानून बनाने की शक्तियां तय करती हैं।
