सोमवार, 24 अगस्त 2026

भारत में संसदीय प्रणाली: अर्थ, विशेषताएं, गुण-दोष | Notes & PYQ

भारत में संसदीय प्रणाली

परिचय -

कभी सोचा है कि जब कोई सरकार बहुमत खो देती है, तो अगले ही हफ्ते नई सरकार कैसे बन जाती है? या फिर प्रधानमंत्री को हर छोटी बात के लिए संसद को जवाब क्यों देना पड़ता है, जबकि अमेरिका का राष्ट्रपति अपनी पूरी चार साल की अवधि बिना ऐसी झंझट के पूरी करता है?

इसका जवाब एक शब्द में है — संसदीय प्रणाली। यही वह ढांचा है जिस पर भारत की पूरी शासन व्यवस्था टिकी है, और यही वजह है कि यह टॉपिक हर प्रतियोगी परीक्षा के पॉलिटी सेक्शन में बार-बार आता है। लेकिन किताबी परिभाषा रटने से पहले इसे असल में समझ लेना ज्यादा काम आता है — क्योंकि यही समझ आपको मेंस के जवाब में या इंटरव्यू में एक कदम आगे रखती है।

इस लेख में हम शुरुआत परिभाषा से करेंगे, फिर व्यवस्था के अंदर झांककर देखेंगे कि यह असल में काम कैसे करती है, और आखिर में यह भी देखेंगे कि 2026 में यह प्रणाली किन चुनौतियों से जूझ रही है — क्योंकि यही वो हिस्सा है जो ज्यादातर लेखों में गायब रहता है।

भारत में संसदीय प्रणाली

संसदीय प्रणाली क्या है?

सीधे शब्दों में कहें तो संसदीय प्रणाली सरकार का वह रूप है जिसमें कार्यपालिका (executive) सीधे विधायिका (legislature) से निकलती है और उसी के प्रति जवाबदेह रहती है। यानी जो लोग कानून बनाते हैं, उन्हीं में से कुछ लोग सरकार भी चलाते हैं — कार्यपालिका और विधायिका अलग-अलग टापू नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। राजनीति विज्ञान की भाषा में इसे "शक्तियों का संलयन" (fusion of powers) कहा जाता है — जो अमेरिका जैसी अध्यक्षीय प्रणाली के "शक्तियों के पृथक्करण" (separation of powers) से बिल्कुल उलट है।

इस तरह की व्यवस्था दुनिया के कई देशों में चलती है — ब्रिटेन, कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत इसके प्रमुख उदाहरण हैं। भारत में इसकी नींव संविधान ने खुद रखी है: केंद्र स्तर पर अनुच्छेद 74 और 75 के तहत, और राज्य स्तर पर अनुच्छेद 163 और 164 के तहत। अनुच्छेद 74 साफ कहता है कि राष्ट्रपति की मदद और सलाह के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका मुखिया प्रधानमंत्री होगा — यही एक पंक्ति पूरी संसदीय व्यवस्था की जड़ है।

पंचवर्षीय योजनाएँ क्या थीं?


संसदीय प्रणाली की मुख्य विशेषताएं


अब जब बुनियादी समझ बन गई है, तो आइए देखते हैं कि यह व्यवस्था व्यवहार में किन खास बातों पर टिकी है।

विशेषता

इसका मतलब

दोहरी कार्यपालिका

राष्ट्रपति नाममात्र (constitutional) प्रमुख है, प्रधानमंत्री असली (real) कार्यपालिका प्रमुख है — फैसले प्रधानमंत्री और उसकी टीम लेती है, राष्ट्रपति उन पर मुहर लगाता है

बहुमत का शासन

लोकसभा चुनाव में बहुमत पाने वाला दल या गठबंधन सरकार बनाता है; उसके नेता को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त करता है

सामूहिक उत्तरदायित्व

उत्तरदायित्वपूरी मंत्रिपरिषद मिलकर लोकसभा के प्रति जवाबदेह होती है (अनुच्छेद 75(3)) — एक मंत्री की गलती पर भी पूरी सरकार गिर सकती है अगर अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाए

राजनीतिक समरूपता

गठबंधन सरकार में भी मंत्री एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमत होकर काम करते हैं

दोहरी सदस्यता

मंत्री बनने के लिए संसद सदस्य होना ज़रूरी है — यानी हर मंत्री एक साथ विधायिका और कार्यपालिका दोनों का हिस्सा होता है

लोकसभा का विघटन संभव

विघटन संभवलोकसभा को समय से पहले भंग किया जा सकता है, राज्यसभा को नहीं — यही वजह है कि राज्यसभा को "स्थायी सदन" कहा जाता है


इनमें से सबसे दिलचस्प विशेषता है — कोई निश्चित कार्यकाल नहीं होना। यह सिर्फ किताबी बात नहीं है, इसके नतीजे असल राजनीति में साफ दिखते हैं। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार महज एक वोट से अविश्वास प्रस्ताव हार गई थी और गिर गई — जबकि उसका पांच साल का कार्यकाल पूरा होने में अभी वक्त बाकी था। इसी तरह 2019 में महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की सरकार महज 80 घंटे में गिर गई क्योंकि वह सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाई। अध्यक्षीय प्रणाली में ऐसा होना लगभग नामुमकिन है — वहां राष्ट्रपति अपना पूरा तय कार्यकाल भोगता है, चाहे संसद उससे कितनी भी नाराज़ क्यों न हो।

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संसदीय प्रणाली में विधेयक कानून कैसे बनता है?

यह वो हिस्सा है जो ज्यादातर लेख छोड़ देते हैं, लेकिन असल में यही वो प्रक्रिया है जो रोज़ की खबरों में — "बिल पास हुआ," "सिलेक्ट कमिटी को भेजा गया," "राष्ट्रपति ने मंज़ूरी दी" — नज़र आती है। चलिए इसे चरण-दर-चरण समझते हैं।

  1. परिचय (Introduction): कोई भी विधेयक लोकसभा या राज्यसभा में पेश किया जा सकता है (धन विधेयक को छोड़कर, जो सिर्फ लोकसभा में ही आ सकता है)। इसे कोई मंत्री पेश करे तो वह "सरकारी विधेयक," और कोई सामान्य सांसद पेश करे तो वह "निजी सदस्य विधेयक" कहलाता है।
  2. प्रथम वाचन: विधेयक का शीर्षक और उद्देश्य पढ़ा जाता है, कोई बहस नहीं होती।
  3. द्वितीय वाचन और समिति को रेफरल: यहीं असली स्क्रूटनी होती है — विधेयक को विभाग-संबंधित स्थायी समिति (DRSC) को भेजा जा सकता है, जो उसकी बारीकी से जांच करती है। यह वह चरण है जहां भारतीय संसद पिछले कुछ सालों में सबसे कमजोर पड़ी है (इस पर विस्तार से आगे बात करेंगे)।
  4. तृतीय वाचन: विधेयक पर अंतिम बहस और मतदान होता है।
  5. दूसरे सदन में यही प्रक्रिया दोहराई जाती है — सिवाय धन विधेयक के, जिस पर राज्यसभा सिर्फ सुझाव दे सकती है, रोक नहीं सकती (अनुच्छेद 110)।
  6. राष्ट्रपति की अनुमति: दोनों सदनों से पास होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है, जो उसे मंज़ूर कर सकता है, वापस भेज सकता है (धन विधेयक को छोड़कर), या रोककर रख सकता है।

समिति वाला चरण खासतौर पर ध्यान देने लायक है। PRS Legislative Research के आंकड़े बताते हैं कि 14वीं लोकसभा (2004-09) में 60% विधेयक समितियों को भेजे जाते थे, 15वीं लोकसभा (2009-14) में यह आंकड़ा बढ़कर 71% हो गया — लेकिन 16वीं लोकसभा (2014-19) में गिरकर 25% और 17वीं लोकसभा (2019-24) में सिर्फ 10% रह गया। यानी बीते एक दशक में लगभग हर 10 में से 9 विधेयक बिना गहन जांच के ही पास होने लगे हैं।

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भारतीय संसदीय प्रणाली के गुण

हर व्यवस्था की तरह इसके भी अपने फायदे हैं, और यही वजह है कि यह इतने देशों में टिकी हुई है।

ज़्यादा जवाबदेही: चूंकि मंत्री लगातार सदन के सामने जवाब देते हैं — प्रश्नकाल में, बहस में, अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए — कार्यपालिका को हर पांच साल में सिर्फ चुनाव का इंतज़ार नहीं करना पड़ता; जवाबदेही रोज़ चलती रहती है।

व्यापक प्रतिनिधित्व: मंत्रिपरिषद में समाज के अलग-अलग वर्गों, क्षेत्रों और विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व होने की गुंजाइश ज़्यादा रहती है — खासकर गठबंधन सरकारों में, जहां अलग-अलग दल अलग-अलग हिस्सों की आवाज़ बनते हैं।

कार्यपालिका-विधायिका में टकराव कम: अमेरिका में राष्ट्रपति और कांग्रेस (संसद) की अलग-अलग पार्टी होने पर अक्सर गतिरोध बन जाता है — यहां तक कि सरकार का "शटडाउन" तक हो जाता है क्योंकि बजट पास नहीं हो पाता। संसदीय प्रणाली में ऐसा ढांचागत टकराव लगभग नहीं होता क्योंकि कार्यपालिका खुद बहुमत से निकलती है।

तानाशाही पर स्वाभाविक अंकुश: सत्ता किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं, बल्कि मंत्रिपरिषद के हाथ में होती है, और वह भी लगातार संसद के सामने जवाबदेह रहती है। अविश्वास प्रस्ताव जैसा हथियार हमेशा मौजूद रहता है।

वैकल्पिक सरकार तुरंत उपलब्ध: अगर मौजूदा सरकार गिरती है, तो नई सरकार बनाने के लिए महीनों इंतज़ार नहीं करना पड़ता — विपक्ष उसी सदन से, उसी बहुमत के आंकड़े के भीतर, वैकल्पिक सरकार बना सकता है।

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भारतीय संसदीय प्रणाली के दोष

अब सिक्के का दूसरा पहलू।

अस्थिरता का खतरा: जो चीज़ फायदा है वही कभी-कभी नुकसान भी बन जाती है — गठबंधन सरकारों के दौर में यह खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि सरकार की उम्र सहयोगी दलों के मूड पर टिकी होती है।

नीतिगत निरंतरता की कमी: जब सरकार का कोई निश्चित, भरोसेमंद कार्यकाल न हो, तो लंबी अवधि की नीतियां बनाना और उन पर टिके रहना मुश्किल हो जाता है — अगली सरकार अक्सर पिछली की नीतियां पलट देती है।

कैबिनेट का प्रभुत्व और अध्यादेश का रास्ता: जब सत्तारूढ़ दल के पास मज़बूत बहुमत हो, तो कैबिनेट लगभग निरंकुश हो जाती है। इसका एक ठोस उदाहरण है अध्यादेशों (Ordinance) का बढ़ता इस्तेमाल — जब सरकार संसद में बहस से बचकर सीधे अध्यादेश के रास्ते कानून बनाना चुनती है। यह संवैधानिक रूप से वैध है, पर इसका बार-बार इस्तेमाल संसदीय बहस की भावना को कमज़ोर करता है।

विशेषज्ञता की कमी: मंत्री बनने की योग्यता चुनाव जीतना है, किसी क्षेत्र का विशेषज्ञ होना ज़रूरी नहीं। ऐसे में स्वास्थ्य, विज्ञान या अर्थव्यवस्था जैसे तकनीकी मंत्रालय कई बार गैर-विशेषज्ञों के हाथ में चले जाते हैं।

घटते बैठक दिवस और बार-बार व्यवधान: यह शायद सबसे चिंताजनक ट्रेंड है। पहली लोकसभा (1952-57) में संसद औसतन साल में करीब 135 दिन बैठती थी; 17वीं लोकसभा (2019-24) में यह आंकड़ा गिरकर सिर्फ करीब 55 दिन प्रति वर्ष रह गया। यानी सत्तर साल में संसद के बैठने के दिन लगभग 60% कम हो गए हैं।

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संसदीय बनाम अध्यक्षीय प्रणाली: मुख्य अंतर

अक्सर एग्ज़ाम में यह पूछा जाता है — दोनों में फर्क क्या है? नीचे एक झलक

पहलू

संसदीय प्रणाली

अध्यक्षीय प्रणाली

शक्तियों का ढांचा

संलयन (कार्यपालिका, विधायिका का हिस्सा)

पृथक्करण (दोनों अलग-अलग)

कार्यकाल

निश्चित नहीं, बहुमत पर निर्भर

निश्चित (जैसे अमेरिका में 4 साल)

कार्यपालिका का चुनाव

अप्रत्यक्ष — बहुमत दल का नेता प्रधानमंत्री बनता है

प्रत्यक्ष — जनता सीधे राष्ट्रपति चुनती है

हटाने का तरीका

अविश्वास प्रस्ताव

महाभियोग (impeachment) — कहीं ज़्यादा जटिल प्रक्रिया

उदाहरण देश

भारत, ब्रिटेन, कनाडा, जापान

अमेरिका, ब्राज़ील


सबसे बड़ा व्यावहारिक फर्क यही है: संसदीय प्रणाली में सरकार गिर सकती है, अध्यक्षीय प्रणाली में राष्ट्रपति को हटाना लगभग असंभव के करीब होता है — भले ही जनता या संसद कितनी भी नाराज़ क्यों न हो।


ब्रिटेन और भारत की संसदीय प्रणाली में अंतर

भारत ने यह मॉडल ब्रिटेन से लिया ज़रूर, लेकिन हूबहू कॉपी नहीं किया। कुछ अहम फर्क:

  • ब्रिटेन का राज्य प्रमुख वंशानुगत सम्राट/सम्राज्ञी है; भारत का राष्ट्रपति जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता है।
  • ब्रिटिश संसद "सम्प्रभु" (sovereign) मानी जाती है — उस पर कोई लिखित संविधान की सीमा नहीं। भारतीय संसद संविधान के दायरे में काम करती है, और सुप्रीम कोर्ट उसके बनाए कानूनों की समीक्षा कर सकता है।
  • ब्रिटेन में प्रधानमंत्री का हाउस ऑफ कॉमन्स (निचले सदन) का सदस्य होना लगभग तय होता है; भारत में प्रधानमंत्री लोकसभा या राज्यसभा, किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है।
  • ब्रिटेन में विपक्ष एक औपचारिक "शैडो कैबिनेट" बनाता है, जिसमें हर मंत्रालय के लिए एक विपक्षी प्रवक्ता होता है। भारत में ऐसा कोई औपचारिक प्रावधान नहीं है।

कनाडा जैसे कुछ अन्य संसदीय देशों में एक और दिलचस्प फर्क मिलता है — वहां "रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव" (constructive vote of no-confidence) जैसी व्यवस्था है, जहां सरकार गिराने से पहले विपक्ष को यह भी दिखाना पड़ता है कि उसके पास वैकल्पिक बहुमत मौजूद है। भारत में ऐसी शर्त नहीं है — यहां सरकार गिराना अपेक्षाकृत आसान और वैकल्पिक सरकार बनाना अलग प्रक्रिया है।

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भारत ने संसदीय प्रणाली ही क्यों अपनाई?

संविधान सभा में इस पर लंबी बहस हुई थी, और डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने इसका बचाव करते हुए तर्क दिया था कि यह व्यवस्था कार्यपालिका को रोज़ की जवाबदेही के दायरे में रखती है — जबकि अध्यक्षीय प्रणाली में जवाबदेही सिर्फ तय समय पर, यानी अगले चुनाव में ही मांगी जा सकती है।

तीन बड़ी वजहें आमतौर पर गिनाई जाती हैं:

  • परिचितता: ब्रिटिश शासन के दौरान भारत पहले से ही इस तरह की व्यवस्था (सीमित रूप में) देख चुका था, तो इसे अपनाना ज़्यादा स्वाभाविक लगा।
  • समावेशिता: भारत जैसे विशाल और विविध देश में मंत्रिपरिषद के ज़रिए अलग-अलग वर्गों को प्रतिनिधित्व देना आसान हो जाता है।
  • टकराव से बचाव: जब कार्यपालिका खुद विधायिका से निकलती है, तो दोनों के बीच का ढांचागत टकराव काफी हद तक टल जाता है।

MCQs (PYQ)

 

1. भारत में संसदीय प्रणाली की सरकार इसलिए है क्योंकि — [UPSC (IAS) 2015]
a) लोकसभा जनता द्वारा सीधे निर्वाचित होती है
b) संसद संविधान में संशोधन कर सकती है
c) राज्यसभा भंग नहीं की जा सकती
d) मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है

उत्तर: (d)
व्याख्या: संसदीय प्रणाली की पहचान यही है कि कार्यपालिका (मंत्रिपरिषद) विधायिका (लोकसभा) के प्रति सामूहिक रूप से जवाबदेह होती है — अनुच्छेद 75(3)। बाकी तीनों विकल्प तथ्यात्मक रूप से सही होते हुए भी "क्यों संसदीय प्रणाली है" का सीधा कारण नहीं हैं।

 

2. भारतीय संसदीय प्रणाली ब्रिटिश संसदीय प्रणाली से इस मायने में भिन्न है कि भारत में है — [UPSC (IAS) 1998]
a) वास्तविक और नाममात्र, दोनों कार्यपालिका
b) सामूहिक उत्तरदायित्व की व्यवस्था
c) द्विसदनीय विधायिका
d) न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की व्यवस्था

उत्तर: (d)
व्याख्या: दोहरी कार्यपालिका, सामूहिक उत्तरदायित्व और द्विसदनीय विधायिका — ये तीनों ब्रिटेन में भी मौजूद हैं। असली फर्क न्यायिक पुनरावलोकन का है: भारत में सुप्रीम कोर्ट संसद के बनाए कानूनों की संवैधानिकता जांच सकता है, ब्रिटेन की सम्प्रभु संसद के कानूनों पर ऐसी कोई सीमा नहीं।

 

3. भारत के संदर्भ में, संसदीय शासन में संस्थागत रूप से निम्नलिखित में से कौन-से सिद्धांत निहित हैं? — [UPSC (IAS) 2013]

  1. मंत्रिमंडल के सदस्य संसद के सदस्य होते हैं
  2. मंत्री तब तक पद पर रहते हैं जब तक उन्हें संसद का विश्वास प्राप्त है
  3. मंत्रिमंडल का प्रमुख राष्ट्राध्यक्ष होता है

कूट:
a) केवल 1 और 2
b) केवल 3
c) केवल 2 और 3
d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)
व्याख्या: "दोहरी सदस्यता" और "विश्वास पर टिका कार्यकाल" — ये दोनों संसदीय प्रणाली के मूल सिद्धांत हैं। तीसरा कथन गलत है क्योंकि भारत में मंत्रिमंडल का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है, राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति) सिर्फ नाममात्र प्रमुख है।

 

4. हमने ब्रिटिश मॉडल पर आधारित संसदीय लोकतंत्र अपनाया, लेकिन हमारा मॉडल उस मॉडल से किस प्रकार भिन्न है? — [UPSC (IAS) 2021]

  1. विधायन के मामले में, ब्रिटिश संसद सर्वोच्च या संप्रभु है, परंतु भारत में संसद की विधि बनाने की शक्ति सीमित है
  2. भारत में, संसद के अधिनियम के संशोधन की संवैधानिकता से संबंधित मामलों को उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान पीठ को निर्दिष्ट किया जाता है

कूट:
a) केवल 1
b) केवल 2
c) 1 और 2 दोनों
d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)
व्याख्या: दोनों कथन सही हैं — ब्रिटिश संसद सम्प्रभु है, भारतीय संसद संविधान के दायरे में काम करती है; और संशोधन विधेयकों की संवैधानिक वैधता पर विवाद होने पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ फैसला करती है।

 

5. सरकार के संसदीय रूप का विचार कहाँ से लिया गया है? — [SSC CHSL 2015, SSC CHSL 2013]
a) रूस
b) आयरलैंड
c) ब्रिटेन
d) अमेरिका

उत्तर: (c)
व्याख्या: भारत ने संसदीय शासन प्रणाली ब्रिटेन (वेस्टमिंस्टर मॉडल) से ली है — यह भारतीय संविधान की सबसे प्रसिद्ध "उधार ली गई" विशेषताओं में से एक है।

 

6. लोकसभा में 'अविश्वास प्रस्ताव' पारित होने पर किसे इस्तीफा देना पड़ता है? — [SSC MTS (21-8-2019) Shift-2]
a) राष्ट्रपति
b) मंत्रिपरिषद्
c) विपक्ष का नेता
d) लोकसभा अध्यक्ष

उत्तर: (b)
व्याख्या: अविश्वास प्रस्ताव पास होते ही सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के तहत प्रधानमंत्री सहित पूरी मंत्रिपरिषद् को इस्तीफा देना पड़ता है — यही वजह है कि संसदीय प्रणाली में सरकार का कोई निश्चित कार्यकाल नहीं होता।

 

7. संसद में 'अविश्वास प्रस्ताव' के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा सही है? — [SSC Tax Assistant 2009]

  1. संविधान में इसका कोई उल्लेख नहीं है
  2. एक 'अविश्वास प्रस्ताव' के बाद दूसरा 'अविश्वास प्रस्ताव' प्रस्तुत करने के लिए छह माह की अवधि अवश्य होनी चाहिए
  3. सदन में प्रस्तुत करने से पहले कम-से-कम 100 व्यक्ति उस प्रस्ताव का समर्थन अवश्य करें
  4. यह केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है

a) 2 और 4
b) 1, 2, 3 और 4
c) 1, 2 और 3
d) 1 और 4

उत्तर: (d)
व्याख्या: अविश्वास प्रस्ताव का संविधान में सीधा उल्लेख नहीं है (यह लोकसभा की कार्य-संचालन नियमावली से आता है), और यह सिर्फ लोकसभा में लाया जा सकता है क्योंकि मंत्रिपरिषद केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। बीच में कोई अनिवार्य छह महीने का अंतराल नहीं है, और समर्थन के लिए सिर्फ 50 सदस्य चाहिए, 100 नहीं।

 

8. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन लोकसभा के बारे में सही नहीं है? — [SSC MTS (5-8-2019) Shift-2]
a) धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है
b) कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इस प्रश्न पर विपक्ष के नेता का अंतिम निर्णय होगा
c) मंत्रिपरिषद के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है
d) केंद्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है

उत्तर: (b)
व्याख्या: अनुच्छेद 110(3) के अनुसार यह फैसला "विपक्ष के नेता" का नहीं, बल्कि लोकसभा अध्यक्ष का अंतिम और बाध्यकारी निर्णय होता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं।

 

9. किस सदन के सदस्य यह कह सकते हैं कि उन्हें मंत्रिपरिषद में 'कोई विश्वास नहीं है'? — [SSC MTS (16-10-2017) Shift-3]
a) केवल राज्यसभा
b) केवल लोकसभा
c) लोकसभा तथा राज्यसभा दोनों
d) किसी भी सदन का नहीं

उत्तर: (b)
व्याख्या: मंत्रिपरिषद सिर्फ लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है (अनुच्छेद 75(3)), इसलिए अविश्वास प्रस्ताव का अधिकार सिर्फ लोकसभा के पास है — राज्यसभा के पास यह शक्ति नहीं।

 

10. भारतीय संसद का अर्थ है — [SSC CGL 2011]
a) राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा
b) लोकसभा और राज्यसभा
c) लोकसभा और विधानसभा
d) विधानसभा, विधान परिषद और लोकसभा

उत्तर: (a)
व्याख्या: अनुच्छेद 79 के अनुसार भारतीय संसद तीन अंगों से मिलकर बनती है — राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा। राष्ट्रपति को अक्सर भूल जाया जाता है, लेकिन वह संसद का अभिन्न हिस्सा है — इसीलिए किसी भी विधेयक को कानून बनने के लिए उसकी अनुमति ज़रूरी होती है।


निष्कर्ष

संसदीय प्रणाली का सबसे बड़ा वादा यही है कि सत्ता कभी बेलगाम नहीं होती — वह रोज़, हर सत्र में, संसद के सामने जवाबदेह रहती है। यही वजह है कि भारत जैसे विशाल और विविध लोकतंत्र के लिए यह व्यवस्था अब तक कारगर साबित हुई है। लेकिन घटते बैठक दिवस, कमज़ोर होती समिति व्यवस्था और गठबंधन युग की नई जटिलताएं यह भी याद दिलाती हैं कि यह व्यवस्था अपने आप में परफेक्ट नहीं — इसे लगातार मज़बूत करते रहने की ज़रूरत है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. संसदीय प्रणाली और अध्यक्षीय प्रणाली में क्या अंतर है?

 संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका विधायिका से निकलती है और उसी के प्रति जवाबदेह रहती है, कार्यकाल तय नहीं होता। अध्यक्षीय प्रणाली में कार्यपालिका (राष्ट्रपति) और विधायिका अलग-अलग चुनी जाती हैं, और राष्ट्रपति का कार्यकाल पहले से तय होता है।

2. भारत में संसदीय प्रणाली किस अनुच्छेद के तहत स्थापित है?

केंद्र स्तर पर अनुच्छेद 74 और 75 के तहत, राज्य स्तर पर अनुच्छेद 163 और 164 के तहत।

3. क्या राज्यों में भी संसदीय प्रणाली लागू होती है?

हां, राज्यों में भी यही मॉडल चलता है — राज्यपाल नाममात्र प्रमुख होता है, और मुख्यमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद के साथ राज्य विधानसभा के प्रति जवाबदेह होता है।

4. भारत की संसदीय प्रणाली ब्रिटेन से कैसे अलग है?

 भारत का राष्ट्रपति निर्वाचित होता है जबकि ब्रिटेन का राज्य प्रमुख वंशानुगत होता है; भारतीय संसद संविधान के दायरे में काम करती है जबकि ब्रिटिश संसद को सम्प्रभु माना जाता है; और भारत में ब्रिटेन जैसी औपचारिक शैडो कैबिनेट व्यवस्था नहीं है।

5. संसदीय प्रणाली में सरकार को कैसे हटाया जा सकता है?

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पास होने पर — यह प्रस्ताव अगर बहुमत से पास हो जाए, तो प्रधानमंत्री सहित पूरी मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ता है।

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