पंचवर्षीय योजनाएँ
परिचय:
अगर आप UPSC, राज्य PCS या किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो "पंचवर्षीय योजनाएँ" वो टॉपिक है जो हर साल किसी न किसी रूप में पूछा ही जाता है — कभी प्रीलिम्स में facts के तौर पर, कभी मेन्स में analysis के तौर पर। दिक्कत यह है कि ज़्यादातर जगहों पर यह टॉपिक सिर्फ एक लंबी टेबल की तरह पढ़ाया जाता है — तारीखें रटो, growth rate याद करो, आगे बढ़ो। न कहानी, न संदर्भ, न यह समझ कि आज 2026 में इसका क्या मतलब है।
इस लेख में हम वही गैप भरने की कोशिश करेंगे। पहले समझेंगे कि पंचवर्षीय योजना असल में है क्या, फिर सभी 12 योजनाओं को क्रम से देखेंगे, हर योजना की सफलता-असफलता की वजह समझेंगे, और अंत में यह भी जानेंगे कि 2017 में योजनाएँ बंद होने के बाद आज भारत में योजना बनाने का तरीका क्या है — क्योंकि यह वो हिस्सा है जो लगभग कोई नहीं समझाता।
पंचवर्षीय योजना क्या है?
सीधी भाषा में कहें तो पंचवर्षीय योजना सरकार का एक पाँच-साल का "बजट प्लान" है — जिसमें यह तय होता है कि अगले पाँच साल में सरकार कहाँ कितना पैसा खर्च करेगी, किन क्षेत्रों को प्राथमिकता देगी, और किन लक्ष्यों को हासिल करना है। जैसे एक स्टार्टअप अपना 5-साल का ग्रोथ प्लान बनाता है — कितना revenue चाहिए, कहाँ investment करनी है — वैसे ही सरकार पूरे देश के लिए यह प्लान बनाती थी।
इसे बेहतर समझने के लिए एक अंतर जानना ज़रूरी है: सरकार का बजट दो हिस्सों में बंटा होता था — गैर-योजना बजट (रोज़मर्रा के खर्च, जैसे कर्मचारियों की सैलरी, सब्सिडी) और योजना बजट (जो पंचवर्षीय योजना के लक्ष्यों पर खर्च होता था, जैसे नए बाँध बनाना या नए उद्योग लगाना)। यानी पंचवर्षीय योजना सिर्फ एक दस्तावेज़ नहीं थी, बल्कि यह तय करती थी कि देश का पैसा किस दिशा में बहेगा।
यह विचार भारत का अपना नहीं था। 1928 में सोवियत संघ में जोसेफ स्टालिन ने दुनिया की पहली पंचवर्षीय योजना लागू की थी, और उसकी सफलता (कम से कम कागज़ पर) से प्रभावित होकर दुनिया भर के नए-आज़ाद देशों ने यही मॉडल अपनाया। भारत में भी विभाजन के बाद गरीबी, बेरोज़गारी और कमज़ोर कृषि उत्पादन जैसी समस्याएँ इतनी बड़ी थीं कि सिर्फ बाज़ार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती थीं — इसलिए केंद्रीकृत योजना को ज़रूरी माना गया।
दिलचस्प
बात यह है कि
यह विचार आज़ादी से पहले ही
आकार लेने लगा था।
1944 में जे.आर.डी.
टाटा, जी.डी. बिड़ला
जैसे बड़े उद्योगपतियों के
एक समूह ने मिलकर
एक साझा प्रस्ताव तैयार
किया था, जिसे "बॉम्बे प्लान"
कहा जाता है — यानी
भारत में नियोजित अर्थव्यवस्था
की ज़रूरत पर उद्योग जगत
खुद सहमत था, यह
सिर्फ सरकारी सोच नहीं थी।
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भारत में नियोजन की शुरुआत कैसे हुई
आज़ादी के बाद 1950 में योजना आयोग की स्थापना हुई,
जिसके पदेन अध्यक्ष खुद
प्रधानमंत्री होते थे। पहले
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का यह मानना
था कि बाज़ार अकेले
भारत जैसे देश को
गरीबी से नहीं निकाल
सकता — इसके लिए राज्य
को खुद आगे आकर
संसाधनों का आवंटन करना
होगा।
बॉम्बे
प्लान के अलावा उस
दौर में गांधीवादी सोच
पर आधारित योजनाएँ और एम.एन.
रॉय का "जन योजना" जैसे
वैकल्पिक विचार भी सामने आए
थे, लेकिन अंततः जो मॉडल अपनाया
गया वह सोवियत तर्ज़
की केंद्रीकृत योजना ही थी — बस
पूरी तरह समाजवादी न
होकर, मिश्रित अर्थव्यवस्था (public +
private sector साथ-साथ) के रूप
में।
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भारत की सभी पंचवर्षीय योजनाएँ — पूरी सूची (1951-2017)
यहाँ हर योजना का सार दिया है — सिर्फ तारीखें नहीं, बल्कि यह भी कि उस योजना ने असल में क्या बदला।
पहली पंचवर्षीय योजना (1951-56)
यह योजना ऐसे समय आई जब भारत विभाजन के ज़ख्म ताज़ा थे और खाद्यान्न संकट गहरा था — इसलिए स्वाभाविक रूप से इसका पूरा ज़ोर कृषि और सिंचाई पर रहा। भाखड़ा नंगल जैसे बड़े बाँध इसी दौर की देन हैं। अर्थशास्त्री के.एन. राज ने सुझाव दिया था कि शुरुआती दो दशकों में भारत को "धीरे-धीरे" विकास करना चाहिए, जल्दबाज़ी में नहीं। यह योजना हैरोड-डोमर मॉडल पर आधारित थी, जो बचत बढ़ाने पर ज़ोर देता है। नतीजा हैरान करने वाला रहा — लक्ष्य 2.1% वृद्धि दर का था, पर असल वृद्धि 3.6% रही। यानी भारत की पहली ही योजना अपने लक्ष्य से आगे निकल गई।
दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61)
अगर पहली योजना कृषि-केंद्रित थी, तो दूसरी पूरी तरह भारी उद्योग और तेज़ औद्योगीकरण पर केंद्रित थी। इसका खाका अर्थशास्त्री पी.सी. महालनोबिस ने तैयार किया था, इसलिए इसे अक्सर "महालनोबिस मॉडल" भी कहा जाता है। घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए आयात शुल्क बढ़ाए गए। लक्ष्य 4.5% था, असल वृद्धि रही 4.27% — यानी थोड़ा कम, पर औद्योगिक नींव मज़बूत हुई।
तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66)
यह योजना कृषि और गेहूं उत्पादन सुधारने पर केंद्रित थी, और राज्यों को शिक्षा जैसे कई ज़िम्मेदारियाँ सौंपी गईं। पंचायत चुनावों की शुरुआत भी इसी दौर में हुई। लेकिन यह योजना भारत की सबसे बड़ी नियोजन विफलताओं में गिनी जाती है — लक्ष्य 5.6% था, असल वृद्धि सिर्फ 2.4%। वजह साफ थी: 1962 का चीन-भारत युद्ध और 1965 का भारत-पाक युद्ध, दोनों ने संसाधन सैन्य खर्च की तरफ मोड़ दिए। इतनी बुरी हालत हुई कि सरकार को 1966-69 तक "योजना अवकाश" घोषित करना पड़ा — यानी तीन साल कोई नई पंचवर्षीय योजना नहीं बनी, सिर्फ सालाना योजनाएँ चलती रहीं। यह एक ज़रूरी सबक है: नियोजन कितना भी अच्छा हो, युद्ध और बाहरी झटके उसे पूरी तरह पटरी से उतार सकते हैं।
चौथी पंचवर्षीय योजना (1969-74)
इंदिरा गांधी के कार्यकाल में शुरू हुई इस योजना का मकसद पिछली विफलताओं को सुधारना था। गाडगिल फॉर्मूले के ज़रिए राज्यों को केंद्रीय सहायता के आवंटन को पारदर्शी बनाया गया — यह फॉर्मूला आज भी संदर्भ के तौर पर पढ़ाया जाता है। इसी दौर में 14 प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ और हरित क्रांति ने कृषि उत्पादन में क्रांतिकारी बदलाव लाया। फिर भी लक्ष्य 5.6% के मुकाबले असल वृद्धि सिर्फ 3.6% रही — तेल संकट और सूखे ने असर डाला।
पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-78)
"गरीबी हटाओ" का नारा इसी योजना से जुड़ा है — रोज़गार बढ़ाना और गरीबी कम करना इसका केंद्रीय लक्ष्य था। न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम (Minimum Needs Programme) की शुरुआत भी यहीं हुई। दिलचस्प मोड़ यह है कि 1978 में नई बनी मोरारजी देसाई सरकार ने राजनीतिक कारणों से इसी योजना को बीच में ही खारिज कर दिया — भले ही असल वृद्धि दर (4.8%) लक्ष्य (4.4%) से बेहतर रही।
रोलिंग प्लान (1978-80)
यह दौर राजनीतिक उठापटक का प्रतीक है। जनता पार्टी सरकार ने पाँचवीं योजना खारिज करके एक नई योजना शुरू की, और जब 1980 में इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में आईं तो कांग्रेस ने उसे भी खारिज कर दिया। "रोलिंग प्लान" का मतलब है ऐसी योजना जिसका हर साल मूल्यांकन होता है और उसी आधार पर अगले साल की योजना अपडेट होती है — यानी लक्ष्य स्थिर नहीं, लगातार बदलते रहते हैं।
छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85)
इस योजना ने मूल्य नियंत्रण खत्म करके आर्थिक उदारीकरण की पहली झलक दिखाई — इसे कई अर्थशास्त्री नेहरूवादी समाजवाद के अंत की शुरुआत मानते हैं। शिवरमन समिति की सिफारिश पर NABARD की स्थापना हुई, जो आज भी कृषि वित्त का सबसे बड़ा स्तंभ है। परिवार नियोजन कार्यक्रम को भी गति मिली। नतीजा शानदार रहा — लक्ष्य 5.2%, असल वृद्धि 5.7%।
सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90)
राजीव गांधी के दौर की यह योजना तकनीक के इस्तेमाल से औद्योगिक उत्पादकता बढ़ाने पर केंद्रित थी। छठी योजना की सफलता ने इसके लिए मज़बूत आधार दिया, और नतीजा भी बेहतरीन रहा — लक्ष्य 5.0% के मुकाबले असल वृद्धि 6.01% तक पहुँची, जो उस दौर की सबसे प्रभावशाली उपलब्धियों में गिनी जाती है।
वार्षिक योजनाएँ (1990-92)
1990 में आठवीं योजना शुरू नहीं हो पाई क्योंकि भारत गंभीर विदेशी मुद्रा भंडार संकट से जूझ रहा था — मशहूर किस्सा है कि सरकार को अपना सोना गिरवी रखकर विदेशी कर्ज़ चुकाना पड़ा था। इसी संकट से निपटने के लिए पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने 1991 में LPG रिफॉर्म्स (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) शुरू किए — जो आधुनिक भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी टर्निंग पॉइंट मानी जाती है।
आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97)
LPG रिफॉर्म्स के बाद शुरू हुई यह योजना उद्योगों के आधुनिकीकरण पर केंद्रित थी। 1 जनवरी 1995 को भारत WTO का सदस्य बना — यानी भारत अब वैश्विक व्यापार व्यवस्था का औपचारिक हिस्सा था। पंचायतों और नगर पालिकाओं को विकेंद्रीकरण के ज़रिए मज़बूत किया गया। नतीजा उम्मीद से बेहतर रहा — लक्ष्य 5.6%, असल वृद्धि 6.8%, जो उदारीकरण के फायदे साफ दिखाता है।
नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002)
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में शुरू यह योजना आज़ादी के 50 साल पूरे होने पर आई थी। इसका फोकस "तीव्र विकास और जीवन गुणवत्ता" के बीच संतुलन बनाना था, साथ ही प्राथमिक शिक्षा को सभी बच्चों तक पहुँचाना। लक्ष्य 7.1% रखा गया था लेकिन असल वृद्धि 6.8% रही — एशियाई वित्तीय संकट का असर इसमें साफ दिखता है।
दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07)
समावेशी विकास पर ज़ोर देते हुए इस योजना ने 8% वार्षिक GDP वृद्धि का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा, साथ ही गरीबी को आधा करने और 8 करोड़ नए रोज़गार बनाने का लक्ष्य भी था। असल वृद्धि 7.6% रही — लक्ष्य से थोड़ा कम, पर भारत की सबसे तेज़ वृद्धि दरों में से एक।
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12)
सी. रंगराजन द्वारा तैयार यह योजना उच्च शिक्षा और दूरस्थ शिक्षा के विस्तार पर केंद्रित थी। 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लाया गया, जो 2010 से लागू हुआ और 6-14 साल के बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा अनिवार्य कर दी। "तीव्र और अधिक समावेशी विकास" इसकी मूल थीम थी। लक्ष्य 9% था, असल वृद्धि 8% रही — 2008 की वैश्विक मंदी के बावजूद यह प्रदर्शन सम्मानजनक माना जाता है।
बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17)
भारत की आखिरी
पंचवर्षीय योजना — इसकी थीम थी
"तीव्र,
अधिक समावेशी और धारणीय विकास"। हर गाँव
तक बिजली पहुँचाना, स्कूली शिक्षा में लैंगिक अंतर
घटाना और हर साल
10 लाख हेक्टेयर हरित क्षेत्र बढ़ाना
इसके प्रमुख लक्ष्य थे। शुरुआती लक्ष्य
9% रखा गया था, लेकिन
2012 में राष्ट्रीय विकास परिषद ने इसे घटाकर
8% कर दिया — जो अपने आप
में इस बात का
संकेत था कि केंद्रीकृत
नियोजन का दौर अब
अपनी सीमाएँ दिखा रहा था।
राष्ट्रीय आय को समझना इतना मुश्किल नहीं है!अगर आप GDP, GNP, NNP, NDP और राष्ट्रीय आय के मापन में confuse होते हैं, तो यह blog आपके लिए है।
पंचवर्षीय योजनाएँ सफल क्यों हुईं, कहाँ असफल रहीं?
अगर आप ऊपर के आंकड़ों को ध्यान से देखें तो एक पैटर्न साफ नज़र आता है: जब भी बाहरी झटका (युद्ध, सूखा, तेल संकट, वैश्विक मंदी) आया, योजना अपने लक्ष्य से पीछे रह गई — चाहे तीसरी योजना हो (युद्ध), चौथी (तेल संकट) या 11वीं (2008 मंदी)। और जब स्थिर माहौल मिला — जैसे छठी, सातवीं और आठवीं योजना के दौर में — नतीजे अक्सर लक्ष्य से भी बेहतर रहे।
इससे एक बड़ा सवाल उठता है जो ज़्यादातर लेख नहीं पूछते: क्या समस्या योजनाओं में थी, या उस दौर के हालात में?
ईमानदारी से कहें तो दोनों। संरचनात्मक स्तर पर योजना आयोग मॉडल की तीन बड़ी सीमाएँ थीं:
1. अति-केंद्रीकरण — दिल्ली में बैठकर पूरे देश के लिए एक जैसा फॉर्मूला बनाना, जबकि केरल और बिहार की ज़रूरतें बिल्कुल अलग थीं।
2. राज्यों की सीमित स्वायत्तता — राज्यों को अपनी प्राथमिकताएँ तय करने की बजाय केंद्र से मंज़ूरी लेनी पड़ती थी, जिससे स्थानीय ज़रूरतों की अनदेखी होती थी।
3. सॉफ्ट बजट कंस्ट्रेंट — सरकारी उपक्रमों को यह पता होता था कि घाटा होने पर भी सरकार बचा लेगी, इसलिए दक्षता की ज़रूरत कम महसूस होती थी।
यही वो वजहें
थीं जिन्होंने आगे चलकर योजना
आयोग को भंग करने
और नीति आयोग जैसे
लचीले मॉडल की ज़रूरत
को जन्म दिया।
क्या आप जानते हैं?भारतीय संविधान के Part IV में दिए गए राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP) भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाने की दिशा दिखाते हैं।
योजना
आयोग से नीति आयोग तक — क्यों हुआ बदलाव?
2014 में सत्ता में आई नई
सरकार ने 2015 में योजना आयोग
को भंग करके उसकी
जगह नीति आयोग (NITI Aayog — National
Institution for Transforming India) बनाया।
यह सिर्फ नाम बदलना नहीं
था — पूरी सोच बदल
गई।
सबसे बड़ा फर्क समझना ज़रूरी है: योजना आयोग के पास राज्यों को फंड आवंटित करने की सीधी शक्ति थी — यानी वह पैसे के ज़रिए राज्यों को अपनी बात मनवा सकता था। नीति आयोग के पास यह शक्ति नहीं है — यह सिर्फ एक थिंक टैंक है, जो नीति सुझाव देता है, डेटा और शोध मुहैया कराता है, लेकिन फंड देने का काम अब सीधे वित्त मंत्रालय और केंद्रीय बजट के ज़रिए होता है।
यह
बदलाव "सहकारी संघवाद" (Cooperative
Federalism) के विचार पर आधारित था
— यानी राज्यों को यह महसूस
कराना कि वे टॉप-डाउन आदेश नहीं
ले रहे, बल्कि साझेदार
के तौर पर नीति
बनाने में शामिल हैं।
रॉलेट एक्ट 1919 – सम्पूर्ण जानकारी (Rowlatt Act in Hindi)
नीति आयोग के तीन दस्तावेज़ — पंचवर्षीय योजना की जगह क्या आया?
यह वो सवाल है जो ज़्यादातर छात्र पूछते हैं पर जिसका जवाब कहीं ठीक से नहीं मिलता: अगर पंचवर्षीय योजनाएँ बंद हो गईं, तो आज भारत की योजना कैसे बनती है?
नीति आयोग ने पंचवर्षीय योजना की जगह तीन अलग-अलग समय-सीमा के दस्तावेज़ बनाने शुरू किए:
· 3-वर्षीय एक्शन एजेंडा — तुरंत लागू होने वाले नीतिगत कदम, जैसे किसी योजना को तेज़ी से लागू करना।
· 7-वर्षीय मध्यम अवधि रणनीति पेपर — मध्यम अवधि के ढांचागत सुधार, जैसे शिक्षा या स्वास्थ्य क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव।
· 15-वर्षीय विज़न डॉक्यूमेंट — बहुत लंबी अवधि की दिशा तय करने वाला दस्तावेज़, जैसे भारत को किस आर्थिक स्तर पर पहुंचना है।
इस मॉडल का फायदा यह है कि यह पाँच साल की कठोर समय-सीमा में बंधा नहीं है — ज़रूरत पड़ने पर लक्ष्य और रणनीति को ज़्यादा तेज़ी से बदला जा सकता है। आज (2026 में) भारत की आर्थिक दिशा वार्षिक केंद्रीय बजट, सेक्टर-विशेष मिशनों (जैसे डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत) और लंबी अवधि के विकसित भारत @2047 विज़न के ज़रिए तय होती है — जो 15-वर्षीय विज़न डॉक्यूमेंट की अगली कड़ी है।
सीधे शब्दों में:
पंचवर्षीय योजना का कठोर, केंद्रीकृत
मॉडल गया, लेकिन "योजना
बनाना" खत्म नहीं हुआ
— यह सिर्फ ज़्यादा लचीला और विकेंद्रीकृत हो
गया।
मौलिक अधिकार = Indian Democracy की सबसे बड़ी ताकत!
चीन और अन्य देशों की पंचवर्षीय योजनाओं से तुलना
यहाँ एक दिलचस्प तथ्य है जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाता है: भारत ने भले ही 2017 में पंचवर्षीय योजना मॉडल छोड़ दिया हो, लेकिन चीन आज भी इसी मॉडल पर चल रहा है। चीन अभी अपनी 15वीं पंचवर्षीय योजना (2026-2030) के दौर में है, और यह उसकी आर्थिक नीति का केंद्रीय स्तंभ बनी हुई है।
फर्क सोच में है। चीन की राजनीतिक व्यवस्था एक-दलीय है, जिससे लंबी अवधि की योजना पर राजनीतिक निरंतरता बनाए रखना आसान होता है — सरकार बदलने पर योजना बदलने का डर नहीं रहता (जैसा भारत में पाँचवीं योजना और रोलिंग प्लान के दौर में हुआ था)। भारत की लोकतांत्रिक, बहु-दलीय व्यवस्था में कठोर पाँच-साला योजनाएँ बार-बार राजनीतिक टकराव का शिकार बनीं — इसलिए लचीला मॉडल भारत के लिए ज़्यादा व्यावहारिक साबित हुआ।
UPSC और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ज़रूरी फैक्ट्स
परीक्षा में अक्सर बारीक चीज़ें पूछी जाती हैं, इसलिए इन्हें खासतौर पर याद रखें:
· सबसे सफल योजना (growth rate के लिहाज़ से): सातवीं पंचवर्षीय योजना (लक्ष्य 5.0%, असल 6.01%)
· सबसे असफल योजना: तीसरी पंचवर्षीय योजना (लक्ष्य 5.6%, असल सिर्फ 2.4%)
· हैरोड-डोमर मॉडल — पहली योजना में इस्तेमाल हुआ
· महालनोबिस मॉडल — दूसरी योजना में इस्तेमाल हुआ
· गाडगिल फॉर्मूला — चौथी योजना में राज्यों को संसाधन आवंटन के लिए शुरू हुआ
· योजना अवकाश — 1966-67, 1967-68, 1968-69 (तीन साल)
· रोलिंग प्लान अवधि — 1978-80
· वार्षिक योजनाएँ — 1990-91 और 1991-92
· योजना आयोग की स्थापना — 1950
· नीति आयोग की स्थापना — 2015
इन तथ्यों को
सिर्फ रटने की बजाय
ऊपर दी गई कहानी
के साथ जोड़कर याद
करें — तब भूलना मुश्किल
होगा।
भारतीय नागरिकता समझो, परीक्षा में score बढ़ाओ!
MCQs
1. (UPSC CSE Prelims 2019) भारत की पंचवर्षीय योजनाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. दूसरी पंचवर्षीय योजना से ही आधारभूत और पूंजीगत वस्तु उद्योगों के प्रतिस्थापन की दृढ़ पहल की गई थी।
2. चौथी पंचवर्षीय योजना ने धन और आर्थिक शक्ति के बढ़ते संकेंद्रण की पहले की प्रवृत्ति को सुधारने का उद्देश्य अपनाया।
3. पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में पहली बार वित्तीय क्षेत्र को योजना का अभिन्न हिस्सा बनाया गया।
a) केवल
1 और 2
b) केवल 2
c) केवल 3
d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) केवल
1 और
2
व्याख्या: दूसरी योजना का मूल फोकस ही भारी उद्योग और पूंजीगत सामान था (महालनोबिस मॉडल), इसलिए कथन 1 सही है। चौथी योजना गाडगिल फॉर्मूले के साथ-साथ आर्थिक असमानता घटाने के उद्देश्य पर भी केंद्रित थी, इसलिए कथन 2 सही है। कथन 3 गलत है क्योंकि वित्तीय क्षेत्र को पंचवर्षीय योजना में पहली बार शामिल करने का दावा तथ्यात्मक रूप से पाँचवीं योजना से नहीं जुड़ता।
2. (UPSC CSE Prelims 2014) बारहवीं पंचवर्षीय योजना का मुख्य उद्देश्य है:
a) समावेशी विकास और गरीबी में
कमी
b) समावेशी और धारणीय (सतत)
विकास
c) बेरोज़गारी कम करने के
लिये धारणीय और समावेशी विकास
d) तीव्र, धारणीय और अधिक समावेशी
विकास
उत्तर:
(d) तीव्र,
धारणीय
और अधिक समावेशी विकास
व्याख्या: जैसा हमने ऊपर
लेख में पढ़ा, बारहवीं
योजना (2012-17) की आधिकारिक थीम
ही "Faster, More
Inclusive and Sustainable Growth" यानी
"तीव्र, अधिक समावेशी और
धारणीय विकास" थी — यह योजना
दस्तावेज़ में शब्दशः दर्ज
है, इसलिए बाकी विकल्प सिर्फ
आंशिक रूप से सही
लगते हैं पर पूरे
नहीं हैं।
3. (UPSC CSE Prelims 2010) ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में वर्णित समावेशी विकास में निम्नलिखित में से कौन शामिल नहीं है?
a) गरीबी में कमी
b) रोज़गार के अवसरों का
विस्तार
c) पूंजी बाज़ार को मज़बूत करना
d) लैंगिक असमानता में कमी
उत्तर:
(c) पूंजी
बाज़ार
को मज़बूत करना
व्याख्या: ग्यारहवीं योजना का "समावेशी विकास" वाला विचार सामाजिक
न्याय — गरीबी घटाना, रोज़गार बढ़ाना, लैंगिक और शिक्षा के
अंतर को कम करना
— पर केंद्रित था। पूंजी बाज़ार
को मज़बूत करना एक वित्तीय/आर्थिक सुधार का विषय है,
समावेशी विकास के सामाजिक ढांचे
का हिस्सा नहीं — इसलिए यह अपवाद है।
4. (UPSC CSE Prelims 2009) किस पंचवर्षीय योजना के दौरान आपातकाल लगाया गया, नए चुनाव हुए और जनता पार्टी सत्ता में आई?
a) तीसरी
b) चौथी
c) पाँचवीं
d) छठी
उत्तर:
(c) पाँचवीं
व्याख्या: पाँचवीं योजना (1974-78) के दौरान ही
1975 में आपातकाल लगा था, और
1977 के चुनावों में जनता पार्टी
सत्ता में आई, जिसने
1978 में इसी योजना को
खारिज कर दिया था
— यह वही घटना है
जो हमने लेख में
पाँचवीं योजना के सेक्शन में
पढ़ी थी।
5. (UPSC CSE Prelims 2009) भारतीय नियोजन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. दूसरी पंचवर्षीय योजना ने भारी उद्योगों की स्थापना पर ज़ोर दिया।
2. तीसरी पंचवर्षीय योजना ने औद्योगीकरण की रणनीति के रूप में आयात प्रतिस्थापन (import substitution) की अवधारणा पेश की।
a) केवल
1
b) केवल 2
c) 1 और 2 दोनों
d) न तो 1 न ही
2
उत्तर:
(c) 1 और
2 दोनों
व्याख्या: दूसरी योजना का भारी उद्योगों
पर ज़ोर तो सर्वविदित
है (महालनोबिस मॉडल)। तीसरी
योजना के दौर में
ही घरेलू उद्योगों की रक्षा के
लिए आयात शुल्क और
आयात प्रतिस्थापन नीति को औपचारिक
रूप से अपनाया गया
था, इसलिए दोनों कथन सही हैं।
6. (UPSC CSE Prelims 2002) भारत में पंचवर्षीय योजना को अंतिम मंज़ूरी किसके द्वारा दी जाती है?
a) केंद्रीय मंत्रिमंडल
b) प्रधानमंत्री की सलाह पर
राष्ट्रपति
c) योजना आयोग
d) राष्ट्रीय विकास परिषद
उत्तर:
(d) राष्ट्रीय
विकास
परिषद
व्याख्या: योजना आयोग योजना का
मसौदा तैयार करता था, लेकिन
उसे अंतिम मंज़ूरी राष्ट्रीय विकास परिषद (National Development
Council) देती थी — जिसमें प्रधानमंत्री,
सभी मुख्यमंत्री और योजना आयोग
के सदस्य शामिल होते थे। यह
एक बारीक पर बार-बार
पूछा जाने वाला प्रोसीजरल
फैक्ट है।
7. (UPSC CSE Prelims 1997) छठी और आठवीं पंचवर्षीय योजनाओं की अवधि क्रमशः 1980-85 और 1992-97 थी। सातवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि थी:
a) 1987-92
b) 1986-91
c) 1985-90
d) 1988-94
उत्तर:
(c) 1985-90
व्याख्या: यह सीधा तिथि-आधारित प्रश्न है। छठी योजना
1985 में खत्म हुई, और
सातवीं योजना उसी साल 1985 से
शुरू होकर 1990 तक चली — इसके
बाद 1990-92 में वार्षिक योजनाओं
का दौर आया, तब
जाकर आठवीं योजना 1992 में शुरू हुई।
8. (UPSC CSE Prelims 1996) आठवीं पंचवर्षीय योजना पिछली योजनाओं से अलग है। इसका महत्वपूर्ण अंतर इस तथ्य में निहित है कि:
a) पिछली योजनाओं की तुलना में
इसका आउटले काफी बड़ा है
b) इसमें कृषि और ग्रामीण
विकास पर मुख्य ज़ोर
है
c) बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) के विकास पर
काफी ज़ोर दिया गया
है
d) औद्योगिक लाइसेंसिंग को समाप्त कर
दिया गया है
उत्तर:
(c) बुनियादी
ढांचे
के विकास पर काफी ज़ोर दिया गया है
व्याख्या: आठवीं योजना (1992-97) 1991 के LPG सुधारों के बाद आई
थी, इसलिए इसका मूल चरित्र
ही बाकी योजनाओं से
अलग था — यह बाज़ार-उन्मुख विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर पर
केंद्रित थी, जबकि पहले
की योजनाएँ राज्य-नियंत्रित औद्योगीकरण पर ज़ोर देती
थीं।
9. (SSC CGL) निम्नलिखित विकल्पों में से सही जोड़ी चुनें:
a) छठी पंचवर्षीय योजना – राजीव गांधी
b) पाँचवीं पंचवर्षीय योजना – इंदिरा गांधी
c) चौथी पंचवर्षीय योजना – जवाहरलाल नेहरू
d) सातवीं पंचवर्षीय योजना – पी.वी. नरसिम्हा
राव
उत्तर:
(b) पाँचवीं
पंचवर्षीय
योजना
– इंदिरा
गांधी
व्याख्या: पाँचवीं योजना (1974-78) इंदिरा गांधी के कार्यकाल में
लागू हुई थी। बाकी
जोड़ियाँ गलत हैं — छठी
योजना इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल
में आई थी, चौथी
योजना भी नेहरू के
बाद इंदिरा गांधी के समय शुरू
हुई थी, और सातवीं
योजना राजीव गांधी के कार्यकाल में
लागू हुई थी।
10. (SSC CGL — स्थैतिक GK) किस पंचवर्षीय योजना का मुख्य फोकस "गरीबी हटाओ" पहल पर था?
a) छठी पंचवर्षीय योजना
b) चौथी पंचवर्षीय योजना
c) पाँचवीं पंचवर्षीय योजना
d) तीसरी पंचवर्षीय योजना
उत्तर:
(c) पाँचवीं
पंचवर्षीय
योजना
व्याख्या:
"गरीबी हटाओ" का नारा और
उससे जुड़ी नीतियाँ (रोज़गार सृजन, न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम) सीधे पाँचवीं पंचवर्षीय
योजना (1974-78) से जुड़ी हैं,
जैसा लेख के उस
सेक्शन में विस्तार से
बताया गया है।
निष्कर्ष
पंचवर्षीय योजनाओं की कहानी असल में सिर्फ तारीखों और growth rates की कहानी नहीं है — यह भारत के एक प्रयोगशील राष्ट्र बनने की कहानी है। 1951 में जिस देश के पास खाने के लिए पर्याप्त अनाज नहीं था, उसने 66 सालों में केंद्रीकृत योजना से लेकर उदारीकरण तक का सफर तय किया, गलतियाँ कीं, उनसे सीखा, और आख़िरकार एक ज़्यादा लचीले मॉडल की तरफ बढ़ा। तीसरी योजना की विफलता हो या सातवीं की सफलता — हर दौर ने अगली नीति को आकार दिया।
परीक्षा की तैयारी के नज़रिए से देखें, तो यह टॉपिक सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि प्रीलिम्स में facts पूछे जाते हैं — बल्कि इसलिए भी क्योंकि मेन्स और इंटरव्यू में अक्सर यह पूछा जाता है कि "भारत ने केंद्रीकृत योजना क्यों छोड़ी" या "नीति आयोग मॉडल पुराने मॉडल से बेहतर है या नहीं"। अगर आपने इस लेख को शुरू से अंत तक पढ़ा है, तो अब आप सिर्फ तथ्य नहीं जानते — आप यह भी समझते हैं कि हर बदलाव के पीछे क्या तर्क था, और आज भारत की आर्थिक दिशा कैसे तय होती है। यही समझ आपको बाकी उम्मीदवारों से आगे रखेगी।
अगर आप इस टॉपिक को मेन्स के नज़रिए से और गहराई से पढ़ना चाहते हैं, तो नीति आयोग की भूमिका और सहकारी संघवाद पर अलग से पढ़ना फायदेमंद रहेगा — क्योंकि यही वो जगह है जहाँ ज़्यादातर छात्र प्रीलिम्स तो पास कर लेते हैं, पर मेन्स में एनालिटिकल सवालों पर अटक जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भारत में कुल कितनी पंचवर्षीय योजनाएँ बनीं?
भारत में कुल 12 पंचवर्षीय योजनाएँ बनीं (1951 से 2017 तक), साथ ही बीच में एक रोलिंग प्लान (1978-80) और दो बार वार्षिक योजनाओं के दौर (1966-69 और 1990-92) आए।
आखिरी पंचवर्षीय योजना कब समाप्त हुई?
बारहवीं और आखिरी पंचवर्षीय योजना 2012 से 2017 तक चली, जिसके बाद इस मॉडल को औपचारिक रूप से बंद कर दिया गया।
योजना आयोग की जगह किसने ली?
2015 में योजना आयोग की जगह नीति आयोग (NITI Aayog) ने ली, जो एक नीति-सुझाव देने वाली संस्था है, फंड आवंटन करने वाली नहीं।
क्या भारत में अभी भी पंचवर्षीय योजना बनती है?
नहीं, पंचवर्षीय योजना का पुराना मॉडल अब नहीं बनता। इसकी जगह नीति आयोग के 3-वर्षीय एक्शन एजेंडा, 7-वर्षीय रणनीति पेपर और 15-वर्षीय विज़न डॉक्यूमेंट के ज़रिए दीर्घकालिक योजना बनाई जाती है, साथ ही वार्षिक केंद्रीय बजट के ज़रिए सालाना प्राथमिकताएँ तय होती हैं।
सबसे सफल पंचवर्षीय योजना कौन सी थी?
वृद्धि दर के लिहाज़ से सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) सबसे सफल मानी जाती है, जिसमें असल वृद्धि दर (6.01%) लक्ष्य (5.0%) से काफी ऊपर रही।

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